अंशु मालवीय की कविताएं

 

                                 

अंशु मालवीय की कविताएं हमारे समय के हिंसा,उन्माद और बर्बरता की जिंदा गवाही हैं।हम जिस चकाचौंध में जी रहे हैं उसके आसपास ही एक गहरा अंधकार रचा जा रहा है और यह कोशिश अनवरत जारी है।यह अंधकार सबकुछ लील रहा है और इसका एहसास तक होने नहीं दिया जा रहा।सांड की तरह उन्मत्त पूंजी और अजेय ताकत मिल कर जो रौंद रहे हैं वह और कुछ नहीं लहलहाता हुआ भविष्य है।ये कविताएं इसी क्षत विक्षत भविष्य के बारे में सोचने के लिए विवश करती हैं।



अंशु मालवीय की कविताएं 



अग्नि उपदेश

भिख्खुओ
सब कुछ जल रहा है ...!

मठ जल रहा है
सुत्त जल रहे हैं
त्रिपिटक जल रहा है
जल रहे हैं शब्द
अर्थ जल रहे हैं उनके
प्रेम जल रहा है,करुणा जल रही है
सद्गुण जल रहे हैं, मैत्री जल रही है
जल रहा है ज्ञान,तर्क जल रहा है
पिघल कर बह रहा है विवेक का लावा
शांति जल रही है, प्रज्ञा जल रही है
जीवन जल रहा है
                      निर्वाण जल रहा है
जल रहे हैं अंतःवासी
                    धम्म जल रहा है...

फहर रही है मनु की पताका
मगध जल रहा है
सब कुछ जल रहा है
                         मठवासियो!
आँखें जल रही हैं
दृश्य जल रहे हैं
दृश्य में बसी दुनिया जल रही है
दुनिया में बसे स्वप्न जल रहे हैं
स्वप्नों में बसे विचार... भाग रहे हैं
छप्पर सिर पर उठाए ...
छप्पर से टपक रही हैं अग्नि बूंदें
अग्नि बूंदों से धरती के अंकुर जल रहे हैं
संभावनाएं झुलस चुकी हैं
उत्तरा के गर्भ पर गिरा है ब्रह्मास्त्र
अश्वत्थामा का
              अजन्मे बच्चे जल रहे हैं
सब कुछ जल रहा है 
                           भंते!

देह जल रही है, चीवर जल रहा है
भिक्षा पात्र जल रहा है
पात्र में पड़ा अन्न जल रहा है
उदर में तलझती भूख जल रही है
कंठ में तड़पती प्यास जल रही है
प्यास में बंदी चित्त जल रहा है
चित्त में जल रही है स्मृति
विस्मृति में भटक रही है बुद्धि
जन्म जल रहा है
                   पुनर्जन्म जल रहा है
गुरु जल रहे हैं, शिष्य जल रहे हैं
जल रहे हैं आलारकालाम और रामपुत्र
जल रही है सुजाता, जल रहा है आनंद ...
कोसल, मथुरा, वज्जि,राजगृह,सारनाथ जल रहे हैं
जल रहा है कुशीनगर
नीरांजना और हिरण्यवती का पानी जल रहा है
गया जल रही है
जल रहा है बोधिवृक्ष
बोधिवृक्ष के नीचे बैठे तथागत जल रहे हैं
समाधि जल रही है
सब कुछ जल रहा है   
                           साधको!

संध्याकाश में चमक रही है
पुष्यमित्र की तलवार
वीथियों में फैला रक्त जल रहा है...

स्थविर जल रहे हैं, जल रहे हैं जातक 
संगीति जल रही है,परिषदें जल रही हैं
अशोक जल रहा है
जल रहा है महेंद्र, जल रही है संघमित्रा
शालवन जल रहा है
                 जल रहे हैं बोधिसत्व
सत्य जल रहा है
मार ने अपनी सेना के साथ घेर लिया है
         पूरे नगर को
तूफान नाच रहा है,पाखंड नाच रहा है
आकाश से हो रही है राख की वर्षा
अंधेरा खंजरों की तरह बरस रहा है
कन्या मेध को निकले
पामरों के अट्टहास से कांप रहा है पाटलिपुत्र
जल रहा है साकेत
                   श्रावस्ती जल रही है
जैतवन में एक वृक्ष से लिपटी
                  अहिंसा जल रही है
विहार जल रहे हैं
स्तूप जल रहें हैं
प्रवज्या जल रही है
चारिकाएं जल रहीं हैं
बुद्ध जल रहे हैं...

विधान जल रहा है
                        नागरिको!
राष्ट्र जल रहा है
जल रहा है धम्मचक्र
मुक्ति जल रही है, समानता जल रही है
न्याय जल रहा है
भविष्य जल रहा है
मातंग की हो रही है भीड़ हत्या,
आम्रपाली बलात्कारियों से बचकर भाग रही है
वैशाली की सड़कों पर...
भूख से पीड़ित हो
अपनी बच्ची को बेच रही है गौतमी
कपिलवस्तु के प्रासादों के सामने
आमात्य बलात्कारी हैं
मंत्री हत्यारे हैं
विदूषक हैं पुरोहित
राजा स्वेच्छाचारी है...
खेतों में
    फसलों के साथ जल रहे हैं किसान
त्रिशूलों पर उछाले जा रहे हैं दासों के शीश
अंगुलिमाल जल रहे हैं...शरण जल रही है
दया जल रही है

सब कुछ जल रहा है
                           मुक्तिकामियो!

सारा आर्यावर्त घृणा की आग में
धू धू कर जल रहा है।

हमारी साधना कब जागेगी अनात्मो!
हम कब करेंगे अग्निमंथन...
अग्नि को निचोड़कर बादल कब बनाएंगे
हमारा वर्षावास कब होगा...
                   बादल जल रहे हैं
                हरीतिमा जल रही है।




नग्न पद्य

नग्न!
सर्वस्व नग्न
सर्वांग नग्न
देह नंगी
           आत्मा नग्न
व्यक्तित्व नग्न
             चरित्र नग्न
आपदमस्तक राष्ट्र की तरह नग्न !
शिराओं में पीव की तरह बहते
                   धर्म की तरह नग्न
फूत्कारते हुए लिंग की तरह नग्न
टपकते हुए विष की तरह नग्न
हिंसा की तरह नग्न
                 प्रतिहिंसा की तरह नग्न
घृणा की तरह नग्न
द्वार द्वार छापे जा रहे रक्त की तरह नग्न
नग्नता के उल्लास की तरह
नग्नता के जयघोष की तरह
Ak 47 की तरह नग्न
वर्दियों की तरह बरहना
                   शौर्य चक्रों की तरह नग्न
अतीव नग्न 
अदभुत नग्न
अपूर्व नग्न कांचन नग्नता
मंत्री के स्वर्ण दंतों की चमक सा नग्न
नगर सेठ की वृद्ध वासना सा नग्न
महामात्य की जिव्हा से टपकते
                              वीर्य की तरह नग्न
मनुष्य के रेवड़ों की तरह नग्न
निर्वयक्तिक
निचाट
निर्वसन
लपलपाती तलवार सा नग्न
दांत से टपकते मंत्रों की तरह नग्न
जलती हुई झोपड़ियों के अग्निहोत्र सा नग्न
समिधा सा नग्न
लोलुप यजमान सा नग्न
हिंसक याज्ञिक की तरह नग्न
यज्ञ सा नग्न, स्वाहा सा नग्न
संस्कृति सा नग्न
सभ्यता सा नग्न
नग्नता का गौरव धारण करता
सत्ता सा नग्न ..........
अपरिमित नग्न
अपार नग्न 
अपरंपार नग्न
लोकतंत्र के मुंह पर गाली सा नग्न
खून के थक्कों पर बने
बूट के निशान की तरह 
                              बेशर्म
                               और नग्न!


हम सब कटुए हैं

हम सब कटुए हैं
                      आमात्य!
अपने कटे हुए सर 
कटी हुई बाहें
कटे हुए पैर
         और क्षत विक्षत आत्माएं लेकर
हम भटक रहें हैं
हम कातर कबंध ........
हम सब कटुए हैं
                       राजन!
हम उस मां के कटे हुए सर हैं
जिसे पातकी पितृत्व की
                मदिरा से चूर
                पाखंडी परशु ने
                धड़ से अलग कर दिया था
                 हम अधूरे धड़ से
                 मां के कटे हुए शीश के कल्ले
                माटी में बोते हैं .....
हम सब कटुए हैं
                   राजपुरूष!
हम उस तापस कुमार के भूलुंठित शीश हैं
जिसे खोखली मर्यादा की म्यान से निकाली गई
और जाति दर्प से विष बुझाई तलवार ने
काट दिया था..........
जिसे किसी ने नहीं सुना
और जो अट्टहास गूंजता है हमारी संस्कृति कंदराओं में
हम उस कटे हुए शीश के अट्टहास हैं........
हम सब कटुए हैं
                  राजदंडाधिकारियो!
हम युगों युगों से
उस युवती की रक्त स्रावित नाक हैं
जिसे पुरुष के अहम ने
जिसे राज पुरुष दंभ ने काट दिया था
हमारी नककटी सभ्यता उस युवती के रक्त में
स्नान कर रही है और डुबकी मार
अपना ईश्वर खोज रही है
हम सब कटुए हैं
                      चक्रवर्ती !
हम उस योद्धा का कटा हुआ अंगूठा हैं
जिसे एक कपटी गुरुता ने काट लिया था
और फिर लगातार कटते रहे अंगूठे
कटते रहे सर
कटती रहीं बांहे
कटती रही उंगलियां
देखो आक्षितिज बिखरे हैं कटे हुए अंगूठे
देखो उन कटे हुए अंगूठों के निशान ले रही है मंत्रिपरिषद
देखो उन कटे हुए अंगूठों की माला पहन रहे हैं महामात्य
हम सब कटुए हैं
                       अभिजात्यो !

हम सब कटुए हैं और बहुमत में हैं
हम खड़े हैं 
               इतिहास के राजपथों पर
अपनी कटी हुई पहचान हथेलियों पर सजाए
आप इस देश को छोड़ें सम्राट
                    अपने नवनीत वदन और संपूर्ण कलेवर के साथ
ये देश हमारा है
ये आर्यावर्त कटुओं का है।




फ़लस्तीन कैसे बनता है 

ग़ज़ा में बच्चे
शहादत का रियाज़ कर रहे हैं ।

तबाहकुन अस्पतालों में
इंक्यूबेटर्स में पड़े
नकली सांसें खींचते हुए

हजारों टन मलबे के
नीचे दबे
झरोंखों से देखते
बाबिल के परिंदों की उड़ान

गाते हैं आज़ादी का नग़मा

आज़ादी का नग़मा कैसे बनता है
                        बाबा दरवेश !

आज़ादी का नगमा
                        बच्चों के ख़ून
                        और बाबिल की परवाज़ से बनता है जान !

ग़ज़ा में बच्चे
शहादत का रियाज़ कर रहे हैं।

माएं रोती हैं
मरियम की तरह
                     ख़ूनआलूदा जिस्म
                     ईसा का
                      सीने से लगाए
मिसाइलों से टकराता है विलाप !

विलाप कैसे बनता है
                          बाबा दरवेश!
विलाप तब बनता है
                      जब फूल क़त्ल किए जाते हैं
                     और कविताएं नंगी घुमाई जाती हैं
                                                          बच्चो!

ग़ज़ा में बच्चे
शहादत का रियाज़ कर रहे हैं।

बाप रोते हुए
सामूहिक क़ब्रों में अपने खून की शिनाख़्त करते हैं
बच्चों के क्षत विक्षत चेहरों में ढूंढते हैं
फ़लस्तीन का नक्शा ! 

फ़लस्तीन कैसे बनता है 
                              बाबा दरवेश !

फ़लस्तीन फटी हुई कबाओं
और टूटे हुए जूतों से बनता है
                              फ़लस्तीन के बच्चो !

आज जितने जैतून के पेड़ कट रहे हैं
कल हमारे देस में उतने बच्चे खिलखिलाएंगे
आज जितने बच्चे शहीद हुए हैं
कल उतने जैतून के पेड़ उग आयेंगे
                         फ़लस्तीन को हरियाली से भरते हुए
                         उस दिन
       मैं भी एक जैतून का पेड़ बन कर फिर से जन्म लूंगा। 



हम कविताएं हैं !

हम कविताएं हैं
                    धर्मराज ! 
आपकी विगलित स्वर्ग कामना के कुत्ते नहीं 
जो उच्छिष्ठ अमरता के टुकड़ों की लालच में 
                 दुम हिलाते 
                 आपके पीछे चले आयें ।
हम कविताएं हैं धर्मराज .....
आपकी जुआरी नैतिकता के रजस्वलित पांसे नहीं
जिन्हें आप चौसर की फड़ पर नग्न 
         चक्कर काटने पर मजबूर कर दें ।
हम कविताएं हैं 
                    धर्मराज !
हमारे अपने नंदित नरक हैं 
हमारी अपनी क़ैद ए तनहाई 
वक़्त के वायदा माफ़ गवाहों की छली हुई 
             हमारी अपनी उम्र क़ैदें हैं:
हमारे अपने मर्त्य स्वप्न हैं और निहत्थे युद्ध 
हमारे पास यक्ष नहीं है प्यास को आध्यात्मिक प्रश्न में तब्दील करता हुआ
हमारे पास ख़ालिस प्रश्न हैं
                             तालुओं में प्यास की तरह उगते हुए 
हम आपके धार्मिक असत्य पर सर नहीं झुकाएंगे
हम सांस्कृतिक अर्धसत्य के हाथों हताहत नहीं होंगे
हम निरपराध कातर कुंजर नहीं
             हम कविताएं हैं धर्मराज !
बच्चों के मासूम खून में डूबा हुआ
                 आपका विनम्र युद्धोन्माद है
साम्राज्य की लालसा को
धार्मिक कर्तव्य बताने वाले योगेश्वर
                     आपके पास हैं
अंगूठों के काटने का निमित्त बनते
निर्मम पार्थ का लाघव है
असमय सूर्य अस्त करने का धूर्त
                         इंद्रजाल है....
सब कुछ आपके पास है
हमारे पास अपने नंदित नरक हैं
दलदल में धंसे हुए रोटी के पहिए हैं
हमारी अपनी निर्कवच असुरक्षा है
हमारा पददलित अभिमान है
हमारे अपने खांडव वन है.....
                     त्राहिमाम त्राहिमाम की आर्त करुणा है
हमारे अपने अंडा सेल हैं
हमारे अपने गौरी लंकेश और कलबुर्गी हैं 
हमारे अपने उमर ख़ालिद और गुलफ़िशा हैं
                और लोकतंत्र का सनातन कारागार है।
हम कविताएं हैं धर्मराज
आपकी कायर वीरता का छद्म नहीं.....
आपको आगाह करने का दुस्साहस करती कविताएं 
ईश्वर होने की माया रचता धर्म हमेशा साथ नहीं देता
मारा जाता है
             किसी रोज़ 
             किसी नामालूम बहेलिए के हाथों।


बिल्किस बानो के अजन्मे इंसाफ़ की ओर से

हम तुम्हारी कोख में थे अम्मी!
उस दिन
जब मारे जा रहे थे तुम्हारे अपने
और तुम्हारा शरीर
धार्मिक मर्दानगी के तले
रौंदा जा रहा था...

हम तुम्हारी कोख में थे अम्मी!
जनमने के इंतज़ार में
दुनिया में
अपनी जगह पाने के इंतज़ार में...
हम तुम्हारी कोख में थे अम्मी!

दुनिया का हिंसक अंधेरा
तुम्हारे भीतर के गुनगुने मुलायम अंधेरे को
चीर रहा था,
तुम बेसुध थीं
और हम चीख रहे थे
कातर आर्त स्वर में...

" हमें जीने दो
  हमें जनमने दो
   हमें रहने दो..."
हम तुम्हारी कोख में थे अम्मी!

हमारी संभावनाओं के दरवाजे पर
धर्म खड़ा था शस्त्र लिए
राष्ट्र खड़ा था बहुमत लिए
मर्द खड़े थे कायरता लिए
हमारे जन्म का वक्त टलता रहा
हमारे जन्म की तारीख़ टलती रही
हमारे जन्म का मुहूरत टलता रहा...

हम अजन्मे वयस्क हो गए

बीस साल बिल्किस बानो
बी s s s स सा s s s ल
हम तुम्हारी कोख में हैं अम्मी...!
जनम का इस्तखारा करते हुए _

बीस साल में
बदल जाती हैं पीढ़ियां
बीस साल में
बदल जाती हैं सरहदें
बीस साल में
बदल जाते हैं मुल्क
बीस साल में
नहीं बदली तो हमारी क़िस्मत।
बस जगह बदली
खेत की जगह
इस बार बलात्कार हुआ अदालत में
बलात्कारियों की जगह इस बार न्यायाधीश थे...

हमारे जनम की तारीख़ फिर टल गई
हम तुम्हारी कोख में हैं अम्मी!

कोख में ही वयस्क हुए
कोख में ही बूढ़े होंगे क्या
और क्या कोख में हो जायेंगे दफ़्न
हमें जनम दो अम्मी
कोख से न सही
आंखों से बहते रक्त से ही सही...

हम तुम्हारी कोख में हैं अम्मी!









अंशु मालवीय

जन्म 12 जुलाई, 1971 को इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश में। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक। 
तक़रीबन पैंतीस वर्षों से सामाजिक-सांस्कृतिक कार्यकर्ता के रूप में सक्रिय। शहरी ग़रीबों एवं असंगठित कामगारों की मज़दूरी और आवास के मुद्दों पर विशेष रूप से काम। साम्प्रदायिकता, जाति और जेंडर के मुद्दों पर कार्यशालाएँ और सांस्कृतिक हस्तक्षेप।

प्रकाशित कृतियाँ —‘दक्खिन टोला’, ‘तिनगोड़वा’, ‘ये दुःख नहीं है तथागत’ (कविता-संग्रह); ‘नार्को टेस्ट’ (लम्बी कविता); ‘शहर और सपना’ (शहरी ग़रीबी और झोपड़पट्टियों का अध्ययन)। 

संपर्क - +91 91709 11718





सभी पेंटिंग्स pinterest से साभार।














Comments

  1. अमिता शीरीं9 May 2026 at 09:05

    अंशु की कविताएं दिल की जगह दिमाग को झिंझोड़ती हैं...अब तक का सारा संचित धू धू कर जल उठता है... ऐसी ही कविताओं की ज़रूरत है जिसमें भस्म हो जाए सारी नफ़रत उनकी...

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  2. विजयशंकर चतुर्वेदी9 May 2026 at 11:26

    अंशु मालवीय की ये कविताएँ वर्तमान हिंसा, सर्वग्रासी सत्ता और सांप्रदायिक क्रूरता के विरुद्ध एक बेचैन व सजग काव्य-प्रतिरोध की तरह सामने आती हैं। इन कविताओं की सबसे बड़ी ताक़त उनका निर्भीक नैतिक स्वर और तीव्र बिंबात्मकता है। मिथक, इतिहास, राजनीति और लाचारी को जिस तरह वे एक साथ पिरोते हैं, वह उनकी कविताओं को विशिष्ट बनाता है।
    प्रदत्त समय से असहमत होने का साहस इन कविताओं को अतिरिक्त धार देता है।

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  3. स्वप्निल श्रीवास्तव9 May 2026 at 19:18

    विचारोंत्तेजक कविताओं के लिये अंशु को बधाई ।
    इन कविताओं में आज का समय दर्ज है।

    ReplyDelete
  4. अंशु भैया हमारे दौर के एक ज़रूरी और महत्वपूर्ण कवि हैं। साहसी कवि हैं, बच बचा के नहीं निकलते, और ऐसे रचते हैं कि दिल और दिमाग़ एक साथ ले आती है, आँखें नम भी होती। है सोचने पर मजबूर भी। भूखे व्यक्ति के लिए जो रोटी है, वही रोटी नारे की तरह आवाज़ भी बुलंद करती हैं। आभार भैया वक्त आवाज बनने के लिए, हमारी आवाज़ बनने के लिए।

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  5. राजेश सक्सेना9 May 2026 at 23:10




    अंशु मालवीय की ये कविताएं,इस समय की आग से जन्मे शब्दों की संवेदना में मिले तीखे गुस्से और प्रतिरोधी स्वरों की दुनिया रचती हैं ! इन कविताओं में कवि ने जो लिखा है वह सिर्फ देखने भर की पीड़ा और क्षणिक संवेदना का उत्स नहीं है,यह कवि के मन की आंतरिक सतह के घनीभूत दर्द के साथ उपजी हैं !

    "अग्नि उपदेश" पहली कविता में सबकुछ जल रहा में कवि का मन भी जल उठा और जिसके ताप से शब्दों की एक लम्बी लपट अग्नि की शब्द मुद्रा के रूप में प्रकट होती है, अंशुल कविता को जीते हैं! इस कविता में मग़ध जलने, स्तूप जलने, विथियां जलने, पिटक जलने,और पुष्यमित्र की तलवार चमक के माध्यम से व्यंजक स्वरों में सत्ता पर तीखा प्रहार है !
    हम सब कटुए हैं, कविता भी एक ऐसी ही कविता है जिसमें हमारे हाथ, गर्दन, जीभ तक कटने के संकेत कवि ने दिये हैं!
    फलस्तीन पर भी बहुत मार्मिक कविता कवि ने लिखी है !
    इन कविताओं का आकार लम्बा होने के बाद भी हर एक शब्द और बिम्ब अपने होने को जरूरत के साथ सार्थक करता है! अंशु भाई को बहुत बधाई और साथ ही कौशिकी का शुक्रिया बढ़िया कविताएं हमारे लिये साझा करने के लिये !

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  6. बोधिसत्व9 May 2026 at 23:19

    अंशु मालवीय अद्भुत कवि हैं। उनके होने से कविता पर भरोसा बनता है!

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  7. ख़ुदेजा़ ख़ान10 May 2026 at 01:08


    अंशु मालवीय की कविताओं के लिए अगर मैं कहूं कि भीतर का जितना आक्रोश,क्षोभ,करूणा और दबी हुई वेदना है उसे व्यक्त किया जाए तो इस तरह कविता में उभरेंगी। इनमें अंतर्निहित जितनी भी पीड़ाजनक अनुभूतियां हैं वे सार्वजनीन हैं।

    शब्दों की तीव्रता और तीक्ष्णता आरम्भ से अंत तक अपनी पकड़ बनाए रखती हैं।
    हर कविता का शिल्प लगभग समान है। लेकिन इनमें समाहित तेवर अपना अलग प्रभाव छोड़ते हैं।
    कविता 'अग्नि उपदेश'
    सामर्थ्यवानों, वर्चस्ववादियों, सत्ताधारियों, तानाशाहों को सम्बोधित करते हुए या कहें ललकारती हुई कविताओं में अपने समय व समाज की गुहार है।
    'नग्न पद्य' सभी तरह की विद्रूप नग्नताओं को उघार के रख देती हैं।
    अंशु मालवीय की कविताएं विचलित करती हैं। सुप्त संवेदनाओं को झकझोर कर जगाती हैं।
    'हम सब कटुए हैं' एक समुदाय विशेष पर लागू होने वाले 'कटुआ' शब्द को, व्यापक संदर्भों में जिस तरह व्यक्त किया गया है वो सोच को उस ऊंचाई तक ले जाती है जहां हमारी अगुवाई करने वालों में अनिवार्यतः यह होनी चाहिए मगर अफ़सोस कि इसका नितांत अभाव ही प्रायः दृष्टिगोचर होता है।
    कविता की अंतिम पंक्ति भाव- विभोर कर देती है -
    "ये देश हमारा है
    ये आर्यावर्त कटुओं का है"

    बाबा दरवेश भी कहते हुए थक गए। इंसानियत को ही कुचल दिया जाए तो इंसान कहां बचेगा फिर.... कविता
    "फिलीस्तीन कैसे बनता है"
    बड़ी त्रासद पंक्ति है ये -
    " ग़ज़ा में बच्चे
    शहादत का रियाज़ कर रहे हैं"
    अपने शब्दों,भाव, विचार में बहा ले जाती हैं कविताएं।

    ये सशक्त कविता है -
    "हम कविताएं हैं धर्मराज
    आपकी कायर वीरता का छद्म नहीं
    आपको आगाह करने का दुस्साहस करती कविताएं"
    और
    "बिल्किस बानो के अजन्मे इंसाफ़ की ओर से-
    हम तुम्हारी कोख में हैं अम्मी"

    ये सारी कविताएं अपना पुरज़ोर प्रतिरोध दर्ज कराने में सक्षम हुई हैं।


    जगदलपुर/ छत्तीसगढ़

    ReplyDelete
  8. आपकी कविताएं अपनी समझ की छोटी सी नोखा पर सवार होकर सागर में उतरने की मेरी एक छोटी सी कोशिश है इन कविताओं को जूते के फीते बांधते हुए कभी नहीं पढ़ना चाहिए जो ऐसा करेगा वह इन कविताओं के साथ अपना कोई भी रिश्ता नहीं बन पाएगा इन कविताहुए मुझे लगा कि मुझे इन कविताओं को बार-बार पढ़ना चाहिए यह कविताएं बार-बार पढ़ने के योग्य है क्योंकि इसमें बहुत कुछ वैचारिक स्तर पर इतना महत्वपूर्ण है कि उसे दिल और दिमाग दोनों की जरूरत है आप हमेशा अच्छा लिखते हैं आपकी कविताओं में शिल्प चुकाने के लिए नहीं है बल्कि कंटेंट को आसान बनाने के लिए है अभी मैं सिर्फ इतना कह सकता हूं कि आपकी कविता की हर पंक्ति ने मुझे आकर्षित किया है और मुझे अपेक्षा की है कि मैं समझ कर उसका आनंद ले सकूं कविता के साथ ऐसा सबको करना चाहिए और आपकी कविताएं ऐसा करने का अपने प का दबाव बनाती है

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