संजय अलंग की कविताएं
संजय अलंग
युद्ध की आग में न जाने कितनी बार यह दुनिया तबाह हुई है और आज भी यह तबाही जारी है। युद्ध की परिभाषा बदल गई,तरीका बदल गया, युद्ध के हथियार बदल गये लेकिन मरने वाले लोग और उजड़ने वाले घर आज भी वैसे ही निरीह, निर्दोष और निसहाय झुलस रहे हैं। सभ्यता के बसने में सदियां बीत जातीं हैं लेकिन उनके राख होने में एक पल नहीं लगता। यहां प्रस्तुत संजय अलंग की नई कविताएं इसी युद्ध को,युद्ध के पीछे की राजनीति को देखती और दिखातीं हैं।
संजय अलंग की कविताएं
लाभ का समीकरण
जीते हैं वे
लाभ के लिए
बनाते हैं
साम्राज्य वे
जानते हैं वे
युद्ध त्रासद नहीं है
न ही विध्वंसकारी
और न ही अराजक
केवल वे ही जानते हैं
कि यह लाभ है
और
रचते रहते हैं वे
सर्वोच्च गणित
लाभ का
लगातार
वे विजेता हैं
वे लड़ते नहीं हैं
वे रण के मैदान में नहीं उतरते
वे युद्ध पर नियंत्रण रखते हैं
वे दोनों पक्षों के साथ होते हैं
इसे वे अनिवार्यता में बदल देते हैं
डर और भय
बने रहने से
युद्ध बना रहता है
युद्ध से उनका
वर्चस्व बना रहता है
संघर्ष का बने रहना
उनके प्रेम का विषय है
उससे उत्पन्न विध्वंस
पुनर्निर्माण के लिए भीख माँगने की
अर्थव्यवस्था बनाए रखता है
और यह चक्र चलता रहता है
आयुध और बंदूकें कहीं भी चलें
खरीदी उनसे ही जाती हैं
लड़ने के लिए धन
उनसे ही माँगा जाता है
और फिर
लड़ने के बाद
पुनः खड़े होने लिए भी
धन वे ही देते हैं
फिर चाहे
वह उनका धन हो
या आयुध या बंदूकें
वे लाभ के समीकरण में
मारते आदमी को ही हैं
वे सिर्फ जीतते हैं
हारता है
आदमी ।
मरता आदमी
मर गया वह आदमी
जिसका एक विचार था
जिसकी एक आवाज थी
जो शांति के साथ चलना चाहता था
आदमी ही इसे देख रहा था
देखते हुए खुद मर रहा था
प्रतिबंध और बहिष्कार भी मर गए थे
‘जोर जुल्म के टक्कर में संघर्ष हमारा नारा है’ का उद्घोष भी
मर गया था
भूख और अन्न भीख में बदल गए थे
तीसरी दुनिया अब गिनती से बाहर हो गई थी
न तो धूप में संगीत था और न ही शीत में बयार
चरवाहे की बांसुरी मर गई थी
रुदन संगीत में बदलता जा रहा था
नारे विलाप में बदल रहे थे
आदमी को मरते देखना सुख का कारक था
आदमी मर रहा था
आदमी मार रहा था
आदमी देख रहा था
आदमी हंस रहा था
समय भी मर रहा था
आदमी के साथ कोई नहीं था, आदमी भी नहीं
राजधानी, गोली, पताका, नारे, पुजारी, धर्म, संगठन..
सभी ने भी उसे छोड़ दिया था
समाज दुबक कर भात खा रहा था
आदमी मर गया था
हंसी, मित्रता, प्यार सलीब से लटके हुए थे
और मरते आदमी को देख रहे थे
सलीब से लहू टपक कर उस पर गिर रहा था
जो राख और धूल के साथ मिलकर कीचड़ बना रहा था
जिसके बीच बैठा आदमी बोटी नोच रहा था
उसकी रक्षा का भी कोई सूत्र नहीं था
वह ही दोषी होना था
उसे ही सजा सुनाई जानी थी
बचने का कोई चारा नहीं था
सब हार रहे थे
पर सभी ओर जीत का शोर था
हारे हुए सब लोग जीत के जश्न में मग्न थे
तब भी लहर उठ रही थी
मरने के लिए छोड़ दिए जाने बावजूद
आशाओं की रेखाएं अभी रेगिस्तान में थीं
भोर का उजास कसमसा कर ही सही, निकल रहा था
मलबे के बीच अंकुर फूटने को था
पसंद नहीं आने के बावजूद
एक बच्चा लहू को साफ कर रहा था
मरता आदमी
बिलबिलाते और कराहते हुए उसे देख रहा था
कराह में आवाज नहीं थी
बच्चा समाप्त होते आदमी को
ऐसे देख रहा था
जैसे उसे शुरू होना हो
पर वह शुरू हो नहीं पा रहा था
और वहीं पड़ा बिलबिला रहा था
शिशु को भी आदमी मार रहा था
आदमी के पीछे आदमी ही था
वह ही उसको मार रहा था।
उनके खेल का मैदान
तंत्र और व्यवस्था बताती है
नकदी का बचाना ही सुरक्षा है
बचत होते ही वह वापस निकालने नहीं दी जाती है
आप को उसे दुबारा पाने या छूने के लिए भी कर देना होता है
यह बचत ही उनकी संपत्ति का आधार है
इसी से वे धन लेते हैं और उसे उधार कहते हैं
वे आपकी बचत ले जाते हैं
वे उसे अपने काम की
टिकाऊ और लाभकारी चीज में बदल देते हैं
आप की बचत ही उनके बढ़ने का साधन है
बदल देते हैं वे उसे कम्पनी, भूमि, कलाकृति, सोना, नगीनों और संसाधनों में
और अब आप ही उनका संसाधन होते हैं
आप से ही उनकी उन्नति और वृद्धि है
बचत को और बढ़ाने के लिए
उनका महत्वपूर्ण निवेश आप ही हैं
वे इससे विस्तृत संपर्क तंत्र बनाते हैं
बचत ली जाती है
नकदी घटती है
सम्पत्ति बढ़ती है
सम्पर्क और पहुंच बढ़ती है
वे धन नहीं बचाते
वे शक्ति का निर्माण करते हैं
आपकी बचत
उनके खेल का मैदान है
उसके रैफरी भी वे ही हैं
और आप किसी भी समय
फाउल प्ले के लिए
बाहर कर दिए जाने वाले खिलाड़ी।
आज्ञाकारिता का प्रशिक्षण
आपको मिला है प्रशिक्षण
दौड़ते रहने का
दौड़ना आपकी सफलता है
यह आप जानते हैं
और यही आपको सिखाया गया है
दौड़ना किसके लिए है
और दौड़ना क्यों है
यह जानने का प्रशिक्षण आपको नहीं है
कितनी तो व्यवस्थाएँ लगाई गईं हैं
बनाई गईं हैं तरह- तरह की संस्थाएँ
रचे गए हैं
प्रणालियाँ, तंत्र और विद्यालय
सिखाने के लिए दौड़ना
समाचार पत्रों में
आपके दौड़ में प्रथम आने की
खबरें ही छपती हैं
यह ही सफलता है
इस दौड़ से ही
आप जीतते हैं
इससे ही कमाते हैं
जीने के लिए
इससे ही जीते हैं
जीने के लिए
व्यय करते हैं
और आप अपनी सम्पत्ति
उन तक स्थानांतरित करते जाते हैं
आप फिर दौड़ में लग जाते हैं
दौड़ते ही जाते हैं
कमाते ही जाते हैं
और सम्पत्ति स्थानांतरण को
तीव्रता देते जाते हैं
सम्पत्ति लगातार कमाते हैं आप
और उस सम्पत्ति को
उन को ही
लगातार हस्तांतरित करते जाते हैं आप
यह ही दौड़ है
इसी के लिए आप प्रशिक्षित हैं
और यह प्रशिक्षण जारी है
आप के यह जानने के बाद भी
जारी रहेगा
प्रश्न, उत्तर, जानना और प्रतिक्रिया
आपके लिए नहीं हैं
आपको सिर्फ दौड़ना है
यह पटकथा
और उससे निर्मित प्रथा
बनी ही है
आप के लिए
और उसका पालन जारी है
धर्म की तरह।
युद्ध का रस
सज गया था मंच
गायन हो रहा था मंच से
वीर रस का
लोग वीरता से
हो रहे थे सराबोर
कुछ ही देर में
वीरता ने
रौद्र रस को भी
समाहित कर लिया
वीर और रौद्र रस मिल कर
दुश्मन को रौंद रहे थे
पढ़े जा रहे थे कसीदे
युद्ध के
साथ में युद्ध के
वीरता का बखान हो रहा था
वीर रस ज्वार की तरह
उफान पर था
कवि - सदालीका
पीछे खड़ा युद्ध को
सजीव देख पा रहा था
जो उसके सामने
उछल कूद मचा रहा था
सदालीका को
लोग मरते दिख रहे थे
मरे लोगों पर
लोग बिलखते दिख रहे थे
क्षत विक्षत लाशों की
चील कव्वे बोटियाँ झिंझोड़ते
नजर आ रहे थे
चारो ओर रुदन और क्रंदन का शोर था
उसे यह सब भयानक रस का
चीत्कार लग रहा था
जिसमें वीभत्स रस मिल कर
वीर रस की धज्जियां उड़ा रहा था
वीरता करुणा को रौंद कर
गर्व से बढ़ी चली जा रही थी
सदालीका के मन में
कविता उमड़ घुमड़ रही थी
यह भी युद्ध कविता थी
उसकी कविता और भावों में
करुण रस ही
बार - बार आ रहा था
नगर के लोग युद्ध में
केवल वीर रस देख रहे थे
उसके साथ
चहूँ ओर के क्षेत्र और
लोग भी
यह ही देख रहे थे
नगर का कवि
युद्ध में करुणा देख रहा था
युद्ध में उसे
करुण रस ही नजर आ रहा था
नगर में लोग युद्ध में
वीर रस ही खोजते थे
और
सदालीका को
युद्ध में
करुण रस ही दिखता
उसे लगता कि
युद्ध के लिए लिखी गई कविता
करुण रस के बिना
कविता ही नहीं है
सदालीका स्वयं से
पूछने लगा कि
क्या तुम
नगर के साथ
रहने योग्य हो?
या नहीं हो?
सदालीका गुमसुम है
उत्तर नदारद है।
दुनिया की गिनती
जुगनू गाँव आया था
वह बीरन के साथ
घूम रहा था
जुगनू और बीरन
मेढ़ पर बैठे थे
बीरन ने
दूर लगे तेंदू की फुनगी पर बैठे धनेश को देख कर कहा-
मेरी दुनिया तो गाँव और खेत हैं
धनेश को अपनी दुनिया कहाँ तक लगती होगी?
फिर खुद ही
एक हाथ उठा
जुगनू को
दूर तक दिखाते हुए बोला-
उस दूरी तक
गाँव की अमराई और
अमराई पार
गेज नदी तक
फिर बीरन चुप हो गया
और जुगनू से पूछने का उपक्रम करते हुए
हाथ को गोल घुमा कर
कहने लगा
दीगर लोगों की दुनिया क्या होती होगी?
फिर खुद ही बोल पड़ा-
कल मोबाइल में देख रहा था
तो बोल रहे थे
‘पहली दुनिया ने
तीसरी दुनिया को सहायता दी है’
जुगनू बोला-
कॉलेज में
गाँव और अपनी दुनिया पर तो
बात नहीं हुई
पर वहाँ वे लोग
दुनिया को बताते हैं
अलग – अलग बाँट कर
जुगनू दूर देखते हुए बोलता रहा-
वे उसे
अलग – अलग नंबर भी देते हैं
पहला, दूसरा और तीसरा विश्व
इसमें न तो हम होते हैं , न धरती, न कोई तत्व
केवल नम्बर ही होता है
इसमें
केवल धन और अर्थ तंत्र
ऊपर तक भरा पड़ा है
नाम देने वाले और बाँटने वाले भी
अमीरी की खूब ऊँची पायदान पर हैं
विश्व उनके खेलने का मैदान है
फिर जुगनू अपने आप में खोया हुए बोलता रहा-
‘दावोस’ में जब होता है सम्मेलन
तो उसके निर्णय और सुझाव
सिंहासनों के लिए बन जाते हैं
पालन के नियम
उसे वे मानते हैं
धर्म की तरह
और पालन करते हैं
पूरी कट्टरता के साथ
अब
धर्म भी पीछे छूट जाता है
अर्थ और उसका तंत्र हावी हो जाता है
बीरन कहने लगा
यह तो एकदम अनजान विश्व है
इसके नापने के यंत्र और प्रणाली अलग हैं
यह तो गाँव को गाँव से बाहर रखने का यंत्र है
न हम उन्हें समझ सकते हैं
और न वे हमें
इसमें न तो यह धरती है और
न ही धरातल
केवल पैसा ही पैसा भरा हुआ है
आदमी केवल उससे खेलता नजर आता है
आदमी और दुनिया गिनती में बदल गई है
जुगनू ने बीरन को देखा और
उसके कांधे पर हाथ रख बोला-
यह नहीं है
कांधे पर हाथ रखने की व्यवस्था
या व्यवस्था साथ चलने की
यह गिनती बढ़ाती ही जाती है
तब भी गाँव
गिनती से बाहर रहता है
बीरन ने बेचैनी से धनेश की ओर देखा
वह उसे उतना ही दूर लगा
जितने कि
नम्बर वाला विश्व
वह नम्बरों की गणना में खो गया
उस गणना में
विश्व और आदमी पीछे छूटने लगे
चारो ओर केवल
धन उड़ रहा था और
लोग विश्व को नम्बरों में बाँट रहे थे
और
सबसे अमीर आदमी
गिनती को शुरू कर रह था
तथा अपने अनुसार चला रहा था।
डाटा या शिकार
वे बड़े शिकारी हैं
वे काम नहीं करते
वे सिर्फ बटोरते हैं
धन को, दिमाग को, बाजार को
और सभी चीजों को
वे हर बटोरी गई चीज को
फिर से
धन में बदल देते हैं
वे बटोरे गए धन से
धन ही कमाते हैं
वे लगातार
नई व्यवस्थाएँ और उपकरण बना
बटोरने की
नई विधाएँ रचते चले जाते हैं
अब उन्होंने
इन नई विधाओं से
दिमाग और बुद्धि को भी
बटोरने में लगा दिया है
उसे वे डाटा कहते हैं
अब वे
उसे भी बेच कर
धन ही कमाते हैं
और हम सब
शिकार बन जाते हैं
न
खुशी से शिकार बन जाते हैं
और बनते ही जाते हैं
बन कर – डाटा
हम अपने आप को
डाटा में बदलकर
इसे प्रगति मानकर
इठलाते हैं
धीरे – धीरे
हम इंसान से
डाटा बनते जाते हैं
और आँकड़ों में बदल जाते हैं
जिसे बेच कर
वे धन कमाते है
हम शिकारी का
शिकार बन जाते हैं
और
उसकी परिसम्पत्ति में
बदल जाते हैं।
दुनिया के बंदों में रिवाज
दुनिया के बंदे
प्रेम को लिखते है
छोटी कविता में
उडेलते हैं प्यार को
वन में रचे जा रहे
अल्हड़ गीत में
बेपरवाह जीवन
प्यार के साथ
बयार सा
बहने लगता है
धरती पर
गाए जा रहे अल्हड़ कवित्त
रचना को गति देते हैं
वे बड़ी रचनाओं में
बदलने लगते हैं
बड़ी रचनाएँ
बड़े काव्य में बदल जाती हैं
जिनके फलक होते हैं व्यापक
इच्छाएँ होती हैं जीवन की
उसे हासिल करते हैं
युद्ध से
बड़ी फलक की कविता में
युद्ध आ ही जाता है
जीवन और दुनिया में
होने की अनिवार्यता के साथ
यह पूरे काव्य पर छा जाता है
हो जाता है काव्य
युद्ध मय
युद्ध सामने आ जाता है
गौरव के साथ
कौम की गरिमा का
आख्यान रचते हुए
बड़े ग्रंथ की बड़ी कविता में
युद्ध उतरता है पन्नों पर
बड़े संवेग के साथ
इन ग्रंथों से
बनते हैं आख्यान
इनसे निकलते हैं किस्से
इन किस्सों से सुनाए जाते हैं व्याख्यान
जो बनाते हैं पुराख्यान
और बनती जाती हैं किंवदंती
जो स्थापित करती हैं मान्यताएँ
इनसे बनती जाती है परम्परा
स्थापित होता जाती हैं धारणाएँ
युद्ध स्वाभाविक लगने लगता है
जिसे मान लिया जाता है
कौम की परम्परा
और यह
पूरी दुनिया में
सब ओर चलता रहता है
काव्य भी युद्ध से
गलबहिंयाँ डाल लेता है
बड़े ग्रंथ की कविता में आया प्रेम
शांति को साथ लेकर
कहीं गुम हो जाता है
युद्ध पूरे वैभव के साथ
प्रत्यक्ष हो जाता है
कौम और परम्परा का
अंग बन जाता है
युद्ध
हो जाता है स्थापित
मन और मस्तिष्क में
रिवाज की तरह ।
वीरता, जो कहीं थी ही नहीं
कहते हैं
कहीं भी और किसी भी ओर चले बंदूक
मरता आदमी ही है
उसे वैधानिक बनाता है
युद्ध
हिंसा से
धरती पर जमे सेपियन्स को
हिंसा से ही
जमे और बने रहने के लिए
एक बदनाम उपकरण को
स्थापित करने का
कृत्रिम बहाना मिल जाता है
उसकी नजर में
मृत्यु का उपकरण
और भी ज्यादा
परिष्कृत हो
सामने आ जाता है
करुणा, प्रेम और शांति की विफलता
मानव को त्रास नहीं दे पाए
और उसे ग्लानि न हो
इसलिए
मानव के रूप में
विफल इंसान
अपनी मनुष्यता की पराजय को
छद्म आवरण में लपेटने के लिए
लग जाता है
एक नए युद्ध की खोज में
जिससे
इंसान अपनी विफल मनुष्यता को
छिपाकर
उस वीरता का राग गा सके
जो कहीं थी ही नहीं।
संजय अलंग
संजय अलंग ख्यात लेखक, इतिहासकार एवं शोधकर्ता हैं।
उनके हिंदी में तीन कविता संग्रह ‘शव’, ‘पगडंडी छिप गई थी’(छत्तीसगढ़ पर एकाग्र) और ‘नदी उसी तरह सुंदर थी जैसे कोई बाघ’ तथा छत्तीसगढ़ी में एक कविता संग्रह – ‘मउहा कान म बोलय बांस’ प्रकाशित हैं।
उनकी एक कविता (बंटे रंग) को संत गाडगे बाबा अमरावती विद्यापीठ, महाराष्ट्र के विश्वविद्यालय पाठ्यक्रम में सम्मिलित किया गया है।उनका एक उपन्यास ‘चलो साथ चलें’ प्रकाशित है।
डॉ. संजय अलंग ने इतिहास और संस्कृति पर दस से अधिक शोध पुस्तकें लिखी हैं। शोध के क्षेत्र में, डॉ. संजय अलंग द्वारा लिखित ‘छत्तीसगढ़ : इतिहास और संस्कृति’ पुस्तक को मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा सर्वश्रेष्ठ शोध शिक्षा लेखन के लिए सर्वोच्च पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। इस पुरस्कृत शोध पुस्तक के अतिरिक्त शोध पुस्तकों में सम्मिलित हैं – ‘छत्तीसगढ़ की जनजातियाँ और जातियाँ’, ‘छत्तीसगढ़ की रियासतें और जमींदारियाँ’ आदि अन्य कई।
इसके अतिरिक्त उनकी कहानी, यात्रा वृतांत, पुस्तक और फिल्म समालोचना आदि भी प्रकाशित हैं।
कुछ और पुस्तकें प्रकाशन की प्रक्रिया में हैं।
उन्हें सूत्र सम्मान, श्रीकांत वर्मा पुरस्कार, दिनकर पुरस्कार, साहित्य रत्न सम्मान, सरस्वती सम्मान आदि से सम्मानित किया गया है।
उन्होंने इतिहास में Ph.D. की है। उनकी मातृभाषा पंजाबी है।
संजय अलंग छत्तीसगढ़ कैडर के सेवानिवृत वरिष्ठ IAS अधिकारी रहे हैं। आईएएस के सेवा काल के दौरान उन्हें भारत के माननीय राष्ट्रपति जी द्वारा, दिव्यांगजनों और वृद्धजनों के लिए किए गए विशेष कार्यों के लिए पृथक पृथक वर्षों में, सर्वोच्च राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त करने का अवसर मिला है।
उनके द्वारा अपने माता जी श्रीमती लज्या - पिता जी श्री अशोक कुमार अलंग जी की स्मृति में योग्य विद्यार्थियों हेतु सम्मान भी प्रदत्त किया जाता है।
सम्पर्क – 75, एश्वर्य रेसीडेंसी, रायपुर, छत्तीसगढ़, पिनकोड – 492006;
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संजय अलंग की ये कविताएँ समकालीन विश्व-व्यवस्था की निर्मम सच्चाइयों का बहुआयामी और वैचारिक रूप से प्रखर प्रतिपादन करती हैं, जहाँ युद्ध केवल भौतिक विनाश नहीं बल्कि सत्ता, अर्थतंत्र और मनुष्य की चेतना पर नियंत्रण का सुनियोजित औज़ार बनकर उभरता है। ‘लाभ का समीकरण’ और ‘उनके खेल का मैदान’ जैसी कविताएँ पूँजी और सत्ता के गठजोड़ को उजागर करती हैं, वहीं ‘मरता आदमी’ और ‘वीरता, जो कहीं थी ही नहीं’ मनुष्य की असहायता, करुणा के क्षरण और निर्मित वीरता के मिथक को गहरी संवेदनात्मक तीव्रता के साथ प्रस्तुत करती हैं। अलंग की काव्य-दृष्टि विशेष रूप से इस बात पर केंद्रित है कि कैसे युद्ध और विकास के नाम पर मनुष्य को ‘डाटा’ और ‘गिनती’ में रूपांतरित कर दिया गया है, जिससे उसकी जीवंतता और मानवीयता लगातार क्षीण होती जाती है। इन कविताओं में करुण रस की प्रधानता, विडंबना का तीखा बोध और प्रतीकात्मकता का प्रभावी प्रयोग पाठक को केवल विचार के स्तर पर नहीं, बल्कि भीतर तक झकझोरने का कार्य करता है। समग्रतः, यह कविताएं आधुनिक सभ्यता की नैतिक विफलताओं, आर्थिक असमानताओं और मानवीय संकट का गहन और आलोचनात्मक दस्तावेज़ है, जो पाठक को आत्ममंथन के लिए विवश करता है।
ReplyDeleteवरिष्ठ हिन्दी कवि संजय अलंग की कविताएं पाठकों के दिलो-दिमाग को मथने का काम करती हैं। वे देश-दुनिया की वर्तमान दशा-दिशा और अपने समय को लेकर प्रश्नाकुल बनाती हैं। वे आज की समकालीन दुनिया में विफल मनुष्यता की पड़ताल करती हैं। वे खेल में जान -बूझकर गंदे सिस्टम द्वारा फाउल प्ले करार दिए जाने वाले खिलाड़ियों की स्थिति से अवगत कराती हैं। संजय अलंग की कविताएं जिस वैचारिकी को सामने लाती हैं,वह साधारण जन और मनुष्यता की पक्षधर हैं। वे इस जन की बेहतरी की लड़ाई में शामिल हैं। वे राह को अन्वेषित करने की जद्दोजहद में शामिल हैं। हमारी बधाई एवं शुभकामनाएं,कवि की सृजनशीलता के लिए।
ReplyDeleteबहुत ही ख़ूबसूरती से समाज एवं उनके पीछे के खेल को प्रस्तुत करने के लिए धन्यवाद 🙏 पढ़ने में बहुत आनंद आया।
ReplyDeleteहमारे समय के महत्वपूर्ण और वक़्त की नब्ज़ पर अपनी उंगली रखने वाले संवेदनशील कवि संजय अलंग जी की ये कविता यथार्थ के धरातल पर साफगोई की बेहतरीन मिसाल है ।
ReplyDeleteआज दुनिया जिस खतरे से जूझ रही है ,इस खतरे के रू-ब-रू और नेपथ्य में कौन है और इस खतरे की आड़ में मुनाफाखोरी का ज़ालिमाना खेल कैसे खेला जा रहा है ।
संजय अलंग जी की ये कविता इन पहलूओं का उजागर करती है ...बधाई।
संजय अलंग द्वारा रचित और “कौशिकी” में प्रकाशित नौ कविताएँ हमारे समय के जटिल सचों को तीखी और संवेदनशील दृष्टि से सामने लाती हैं।
ReplyDelete“लाभ का समीकरण” युद्ध के पीछे छिपे स्वार्थ को उजागर करती है, “मरता हुआ आदमी” संवेदनाओं के क्षय को, और “युद्ध का रस” करुणा के बिना वीरता की अधूरी सच्चाई को रेखांकित करती है।
सादगी में निहित गहराई लिए ये कविताएँ कम शब्दों में बड़े सच कहती हैं और पाठक को भीतर तक झकझोर देती हैं।
संवेदनाओं को उकेरती शानदार भावाभिव्यक्ति।आयुध की खरीदी, लडने के लिए धन, लाभ के समीकरण में मरता तो आदमी ही है।यथार्थ के धरातल पर कटु सत्य की अभिव्यक्ति।
ReplyDeleteसमसामयिक कविताएं, विश्वस्तरीय नीतियों पर प्रहार,
ReplyDeleteसामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक प्रणालियों पर तीखा व्यंग्य
प्रगति के नाम पर नैतिकता,प्रेम,संवेदनाओं ,मनुष्यता का ह्रास होना और उनका युद्ध और डाटा में तब्दील होना। सच में अंदर तक झकझोर कर रख देती हैं।इतनी अच्छी कविताओ के लिए हार्दिक बधाई आपको ।
संजय अलंग की ये कविताएँ तीखे व्यंग्य, गुस्से और प्रहार की ज़रूरी कविताएं लगी ।जिनका अंदाज ही अलग लगा। अभिनंदन कवि।
ReplyDeleteमरते समय में जीये जाना हमारे वश में नहीं है, वरन अभिशाप है। लेकिन मरते आदमी को देखना और उसकी शिनाख्त करना संवेदनशीलता है। सामान्य व्यवस्था हो या युद्ध के हालात, आदमी चकरघिन्नी हुआ पड़ा है। अपने किए, अपने सोचे पर अख़्तियार नहीं रह गया है। जो बेघर हैं, आर्थिक असुरक्षा से घिरे हैं, उनकी तो कोई गिनती ही नहीं..संपन्न कहे और समझे जाने वाले भी 'स्वतंत्र' नहीं हैं। कहने को अफसर, नेता, मंत्री कमाई के ढेर पर बैठे हैं, लेकिन उनकी मनुष्यता की झोली खाली है। असल मलाई बाजार वाले मार रहे हैं। धनपतियों और सत्ताधीशों की जुगलबंदी ने दुनिया को कबाड़खाना बना दिया है। धन से धन तक की व्यवस्था में आदमी मरता चला जा रहा है। संजय अलंग ने इन स्थितियों को ठीक-ठीक पकड़ा है। अपनी कविताओं में आदमी की स्थिति चिह्नित कर, सत्ता और व्यवस्था के विध्वंस को 'लोकेट' करते हैं। संजय अलंग की यह दृष्टिसंपन्नता पाठक के भीतर भी संवेदना जगाती है।
ReplyDelete*छटपटाती संवेदनाएँ* हैं...!
ReplyDeleteवैश्विक धरातल के क्रूर यथार्थ पर तर्जनी उठातीं, आहत वर्तमान पर प्रश्नचिह्न लगातीं, मन को उद्वेलित करतीं, *नौ गुना*' अशांत करतीं... "*युद्ध के विरुद्ध लिखी गईं शांति की ये नौ कविताएँ*"..!
सहज-सरल-साधारण शब्दों में कही गई पंक्तियाँ जब एक गहन कथ्य बन जाती हैं तो वे उस रचना को तत्काल असाधारण बना जाती हैं...और यही वैशिष्ट्य है *डॉ. संजय अलंग* की इन कविताओं का।
ये कविताएं थाम लेती हैं ठिठके हुए पाठक को जब *दो पंक्तियों के बीच*' पसरी हुई ख़ामोशी इतना शोर मचा जाती है...जब *कविता पढ़ रही होती है पाठक के छटपटाते मानस को*.. और उसे स्तब्ध कर देती है..निःशब्द कर देती है।
कैसी मारक पंक्तियाँ हैं ये, देखिए. ..
" *आयुध और बंदूकें कहीं भी चलें...मारते आदमी को ही हैं*"
इन सभी कविताओं के केंद्र में *आज का आदमी*' है पर *आदमी* कहीं है ही नहीं ...है तो बस युद्ध-पिपासु भ्रष्ट शासन-तंत्र,स्वार्थी सत्ता, क्रूर राजनीति, जिनकी चाहत है अनवरत-युद्ध...ताकि हो उनकी निर्बाध विजय..उनके बनाये मोहरों के संघर्ष से,मात से, मृत्यु से... जिन्हें 'आदमी' का नाम मिला है ...!आदमी का श्रम, धन,जीवन, साँसें सब कुछ हृदयहीन शासन तंत्र के उपकरण मात्र हैं... कैसी विडम्बनायें है कि पूरी तरह *हारे हुए लोग जीत की जश्न में मग्न* हैं.. तभी उभरती है एक सटीक और सार्थक पंक्ति...*आदमी का मरना,समय का मरना हो जाता है*...विफल हो जाता है *मानव* के रूप में *इंसान*...और यहीं *सफल हो जाती है कविता*!
...अल्हड़ गीत का माधुर्य जब युद्ध की विभीषिका में परिणत हो जाता है ...शनैः-शनैः विलाप में परिवर्तित हो जाता है संगीत ..तो पाठक के अन्तर्मन में सिसक उठती है एक टीस और बदल जाती है एक चीत्कार में क्योंकि वह देख पाता है अत्यंत स्वाभाविकता से एक परिवर्तन को परम्पराओं में ढलते हुए। यह चीत्कार, यह पीड़ा , यह वेदना ही इन पंक्तियों की अनुगूंज हैं जो मानस-पटल पर अवश-हताश पड़ी रहती हैं कुछ क्षण तक और अचानक ही झकझोर जाती हैं चेतना को...और यही वे क्षण होते हैं जब *कविता पढ़ लेती है पाठक को*...और यही बना जाती है विशिष्ट *डॉ. संजय अलंग* की लेखनी को, शैली को..।
अभिनंदन *कौशिकी* का
🙏🏼
...*अर्पणा 'अंजन'*
(बिलासपुर)
संजय अलंग जी की कविताओं के केन्द्र में 'आम आदमी' है।
ReplyDeleteआम आदमी में जो आदमियत बची है उसी के कारण वह मर रहा है जबकि होना यह चाहिए कि अपनी आदमियत,अपनी इंसानियत के बूते इन्हें और अधिक सुरक्षित जीवन जीने की अधिकार मिलना चाहिए लेकिन 'वे' जो क़ाबिज़ हैं इन पर। 'वे' जिनसे शासित है आम आदमी और तीसरी दुनिया के लोग।उनके 'लाभ के समीकरण' में उनके 'खेल का मैदान ' है ये आम आदमी क्योंकि आम जनता की बचत ' उनका' निवेश है।
अपनी जिजीविषा के बूते संघर्ष,श्रम- परिश्रम करता है निरीह आदमी और झोलियां भरती हैं ' उनकी '।
'वे' बाहुबली हैं,धन पिपासु हैं, स्वार्थी हैं,अति महत्वाकांक्षी हैं।
पूंजी और सत्ता के गठजोड़ से जो वर्चस्व स्थापित किया जाता है उसके लिए ज़रूरी हो जाता है कि जनता को ' आज्ञाकारिता का प्रशिक्षण' देकर दौड़ में उलझाए रखना।
क्योंकि इनकी दौड़ 'सम्पत्ति स्थानांतरण को तीव्रता देती है'
' दुनिया की गिनती' अर्थ और तंत्र पर टिकी होती है इसीलिए अभी भी कई देश तीसरी दुनिया की श्रेणी में आते हैं।
युद्ध के रौद्र,वीर और वीभत्स रसों में कवि ही करुण रस को देख पाता है।
डाटा या शिकार कविता
उपभोक्ता के शिकार होने के कारण स्पष्ट कर देती है।
धीरे-धीरे युद्ध अनिवार्य कर दिए जाते हैं जैसे ये हमारी परम्परा का हिस्सा हों।
ये कविताएं 'उनका' असली चेहरा दिखाती हैं जो अपने इशारों पर दुनिया ( आम जनता)को चलाने के लिए आकंठ डूबे हैं।
ख़ुदेजा ख़ान
जगदलपुर/ छत्तीसगढ़
अलंग भाई की कविताएँ बढ़िया हैं!
ReplyDeleteउनका काव्य बोध विरल है!