विमल कुमार की कविताएं

विमल कुमार 


विमल कुमार की कविताएं अपने मुहावरे के कारण अलग से पहचान में आ जाती हैं। कहते कहते कुछ गंभीर और बेचैन कर देने वाली ये कहन शैली लंबे समय से हिंदी कविता को समृद्ध कर रही है।इन कविताओं में जीवन के कोमल क्षणों से लेकर मिलने और खो देने की विह्वल कर देने वाली पीड़ा है।हमारा समय इन कविताओं में बोलता है।




एक कप चाय की स्मृति!

इस बुरे वक्त में
चला गया एक अच्छा आदमी
 
नहीं जाना चाहिए था उसे अभी
हम सबको बीच मझधार में छोड़कर
लेकिन वह चला गया 
थोड़ी देर पहले यह दर्दनाक खबर मिली है

किसे पता था
वह एक हादसे में मारा जाएगा
अचानक एक दिन चला जाएगा 
इस बुरे वक्त में 
उसकी थी बहुत जरूरत सबको 
 
लेकिन वह चला गया 
आखिर क्यों अच्छे लोग 
चले जाते हैं इस दुनिया से
अचानक
बिना इत्तला किये किसी को 
क्यों चले जाते हैं 
उन्हें तो इसी दुनिया में रहना चाहिए 
यह दुनिया थोड़ी और अच्छी हो जाए
लेकिन अच्छे लोग हमेशा चले जाते हैं
बिना किसी को बताए

वह आदमी भी चला गया 
जो एक अच्छा नागरिक था 
एक ईमानदार व्यक्ति था 
एक भरोसेमंद पति था 
एक मददगार दोस्त 
सह्रदय पड़ोसी 
बहुत ही सहज - सरल 
जो सबको बहुत प्यार करता था लेकिन उसके हाथ में नहीं था 
अपना जीवन
नहीं रोक सकता था
वह मृत्यु को 
वह कई दिनों से लड़ता रहा उससे
अंत में वह पराजित हो गया

वह तो चाहता था 
इस संसार को थोड़ा और सुंदर बनाया जाए
एक फूल खिलाया जाए
उसे भी नहीं पता था 
एक दिन वह चला जाएगा
इस दुनिया से 
बिना किसी को कुछ बताए


वह भी चाहता था 
इसी दुनिया में जीना
सांस लेना 
वह भी चाहता था 
वह अपने जीते जी चांद को देख लेना 
धरती पर 
धूप को जाडे में खिलता हुआ देख लेना 
एक खुशबू को फैलते हुए देख लेना 
चारों तरफ 
एक सितार को बजते हुए देख लेना
पड़ोस के घर में 

वह तो सुनना चाहता था 
राग भैरवी सुबह सुबह
देखना चाहता था 
किसी का नृत्य 
चाहता था
कोई बांसुरी बजाता रहे 
नदी के किनारे
चाहता था 
नहीं मरे कोई भूख से
उसके शहर में
वह नहीं चाहता था 
कहीं कोई बम गिरे
निर्दोष बच्चे मारे जाएं 
कहीं भी दुनिया में


लेकिन वह चला गया
उसे जाना ही था एक दिन
उसे बहुत कुछ लिखना था
उसे बहुत कुछ अभी कहना था लेकिन एक आदमी
जो बहुत सुंदर था 
एक नेक दिल था
चला गया
एक स्वप्न छोड़कर 
कोई उम्मीद छोड़कर
उसकी एक तस्वीर है सबके पास
बची हुई
जिसमें उसकी निश्चल हंसी कैद है
सफेद दाढ़ी में 
टेलीफोन पर उसके ठहाके हैं
दर्ज कानों में
उससे एक मुलाक़ात याद है
और सड़क के किनारे
ढाबे में एक कप चाय की स्मृति!





क्या हूँ मैं?

आखिर मैं मूलतः क्या हूँ
एक दर्जी
या एक बढ़ई
या बिजली बनानेवाला
कई बार कपड़े सिले भी मैंने 
कई बार रंदा भी मारा
कई बार स्विच भी ठीक किया
आखिर मैं समझ नहीं पाया खुद को 
मूलतः मैं क्या हूँ
घर के लोगों ने यह भी जानना चाहा 
क्या मैं उनके लिए एक नाव हूँ
या एक मल्लाह
अपनी प्रेमिका के लिए
एक आसमान हूँ या चाँद 
मूलतः मैं क्या हूँ
कई बार नाव की तरह पार किया या जीवन
कई बार बचाया लोगों का जीवन
कई बार नीला हुआ मेरा रंग
कई बार बादलों में जा छुपा
इसलिए कई बार मैं समझा नहीं
मूलतः मैं क्या हूँ
कोई पूछता है मुझसे
मूलतः तुम कहाँ के रहनेवाले हो
क्या जवाब दूं 
कई जगह जन्म हुआ मेरा
कई जगह मरा मैं
कई जगह दफनाया गया जीते जी
कई लोगों ने मुझसे यह भी पूछा
मूलतः तुम करते क्या हो
कभी किसी दफ्तर में दिखते हो
कभी बेरोजगार 
क्या बताऊँ मैं उन्हें
सड़क के किनारे एक ढाबा भी खोला था 
कभी दूध के पैकेट घर घर पहुंचाया
कभी चलाई गाड़ी
पेट काटने के लिए 
कभी क्लर्क कभी चपरासी भी
कभी तो अनुवाद किया 
अपने जीवन का ही
इसलिए क्या कहूँ
मैं मूलतः क्या हूँ
क्या है मेरा उत्स
मुझे नहीं मालूम
मैं मूलतः एक मनुष्य हूँ
कभी कभी मेरे भीतर एक पशु भी जागता है
मैं जब जीवन भर लड़ता रहा खुद से
कैसे कहूँ मैं मूलतः क्या हूँ
जब किसी चीज़ का मूल बचा नहीं 
जब सब कुछ उखड़ गया 
लुट गया
नष्ट हो गया
यह बता पाना मुश्किल है बहुत मेरे लिए
मैं मूलतः क्या हूं
फिलहाल तो मैं एक प्रश्न हूँ
जिसका उत्तर दिया जाना बाकी है
उस उत्तर में छिपा है

मूलतः मैं क्या हूँ 
एक दिन मैंने ही पूछा खुद से सवाल
मैंने खुद को बताया

फिलहाल एक पति हूं 
कई बच्चों का बाप
एक किराएदार 
एक कर्जदार 
एक बिंदु एक अनुस्वार !




सबसे सुंदर जगह


संसार की सबसे सुन्दर जगह है तुम्हारी बाहों में 
यहाँ कोई भीड़ भाड़ नहीं है
'न ही ट्रैफिक का कोई शोर 
न किसी तरह का कोई प्रदूषण 

बहुत शांत और निर्जन इलाका है ये 
ये सिर्फ मेरी जगह है 

यहीं मेरी सुबह भी होती है 
यहीं मेरी शाम भी ढलती है 
यहीं रात भी गिरती है बर्फ की तरह
यहीं चाँद भी उतरता है सीढ़ियों से 
यहीं मैं रोता हूँ कभी कभी 
यहीं करता हूँ कबूल अपने गुनाह सारे 

संसार की सबसे कीमती जगह भी यहीं है 
मेरे लिए 
तुम्हारी बाँहों में 

पर इसे खरीदा नहीं जा सकता है 
किसी फ्लैट की तरह कभी कभी 
यहाँ छल प्रपंच के लिए नहीं कोई जगह
यहाँ सिर्फ तुम्हारा ख्याल है 
 
इस जगह पर एक फूल भी खिलता है
मुस्कराता हुआ 
यहीं एक इन्द्रधनुष भी बनता है
आसमान पर 
यहीं बादल भी बरसते है
झूमते हुए
यहीं एक खिड़की भी खुलती है 
समुद्र की ओर
एक दरवाज़ा भी है यहाँ 
जहाँ से देखा जा सकता है
सामने खड़े पहाड़ों को 

एक झरना भी बहता है यहाँ 
एक पेड़ भी हैं यहाँ छायादार 
जिसके नीचे सुस्ताया जा सकता है 
कुछ पल के लिए ही सही 

यहाँ वक़्त का पता नहीं चलता 
घड़ियाँ रूक जाती है यहाँ 
यहाँ व्यर्थ हो जाती है 
हर तरह की सत्ताएं 

यही संसार की सबसे उर्वर जमीन है  
यहीं लिखता हूँ मैं एक कविता तुम्हारे लिए  

यहीं मैं देखता हूँ एक सपना 
संसार को बदलने का भी 
यहीं नींद में बड़बड़ाता हूँ मैं

इसी जगह अगर खुद जाये मेरी कब्र 
यही पर चाहूँगा दफन होना  
फिर कुछ दिन और चाहूँगा जीना भी 
तुम्हारी बाहों में  
एक बार फिर से 
एक नयी जिन्दगी।




गुमशुदा जिंदगी


मैँ भी तलाश कर रहा हूँ
उस गुमशुदा आदमी को 
जो मेरे भीतर रहता था
पर गुम हो गया है कहीं 
बहुत खोजने पर नहीं मिलता
मेरे भीतर 
नहीं आती उसकी अब कोई आवाज़
कोई धड़कन 
नहीं दिखता उसका चेहरा
न बाल न होंठ
क्या खा गया उसे आसमान
क्या लील गयी उसे अब धरती
क्या खींचकर ले गया नदी में
कोई घड़ियाल
क्या ले गयी उसे उठाकर कोई चील

यह कैसा गुमशुदा आदमी है
जो बाजार में नहीं खोया
जो मेले में नहीं खोया 
जो किसी भीड़ में नहीं खोया
न किसी जंगल मे
न किसी घाटी में
वह अपने भीतर ही खोया 
अपने स्वप्न के भीतर
अपनी नींद में
अपने रक्त में
अस्थि मज़्ज़ा में
अपनी आवाज़ में खोया
वह 
गुमशुदा है
रास्ता भटका कोई मुसाफिर नहीं
अब नहीं मिलेगा वह
जब खो गया उसका शहर
खो गया उसका बचपन
उसकी भाषा भी खो गयी
खो गयी गन्ध 
होना था उसे गमशुदा
कितना भी पोस्टर चिपका लो
दीवारों पर
कर दो एलान रेडियो पर
रिक्शे पर माइक से
जिसे मिले यह गुमशुदा आदमी
रंग गेउहां
कद 5 फीट 6 इंच
बाल सफेद
उम्र 45 के आसपास
गाल पर कटने के निशान
फौरन इत्तिला करें पाएं इनाम
यह गुमशुदा कभी नहीं मिलेगा
क्योंकि इस घड़ी को भी
अब पुराना समय नहीं मिलेगा जो बीत गया
इस पुल को भी खोना था 
पुराना पुल
गुम होना था नदी को भी अपने भीतर
होना था गुमशुदा
शब्दों को भी
कविता के भीतर
रंगों को गुम शुदा होना था
चित्रों के भीतर
गुमशुदा हो गयी यह जिंदगी
अपनी छीजती जिंदगी के भीतर।



मेरा आख़िरी बयान

नहीं कोई गिला
न कोई शिकवा
 
कौन आया
कौन नहीं  
कौन रोया 
कौन नहीं
 
किस ने दी मुझे श्रद्धांजलि
किस ने किया शोक व्यक्त  
कौन बोला शोक सभा में 
किसने लिखा कोई लेख
अख़बार में छपी खबर या नहीं

मैं मरुँ 
तो पता भी नहीं चले किसी को 
कि मैं मर गया हूँ

भीड़ नहीं जमा करनी मुझे 
कैमरे से दूर ही रहे मेरा चेहरा
तो ठीक रहेगा  
नहीं दिखाया जाऊं दूरदर्शन पर मैं 

कोई मंत्री यह न कहे
अपनी बाईट में 
कि मेरे मरने समाज में कोई शून्य पैदा हुआ है 
यह सबसे अधिक खोखला शब्द लगता है मुझे 

मुझे मालूम है  
बच्चे की फीस जमा करना अधिक जरुरी है
उससे ज्यादा जरुरी बिजली का बिल जमा करना 
अस्पताल ले जाना माँ को  
इसलिए  
नहीं कोई शिकवा 
न कोई गिला 
कोई आया या नहीं
बहुत सारे जरुरी काम होते हैं लोगों को 

लाखो करोड़ों लोग रोज मरते हैं
इस दुनिया में 
अगर मैं मर ही गया तो क्या हुआ 
कोई तमाशा नहीं खड़ा करना चाहता हूँ 

मेरी पत्नी भी मेरे बगैर जीना सीख ले 
मेरे बच्चे भी
वे भी न कहें कि मैं मर गया हूँ
कोई पूछे तो इतना कह दें 
हां वो चले गए चुपचाप
बिना किसी को बताये  
बहुत तकलीफ में थे वे
इस मुल्क के हालात से 
 
जीते जी कहाँ जी सका दुनिया में
 
थोड़े दिन के लिए
मुझे अब अकेला छोड़ दो 
चुनाव से ठीक पहले 
मेरी इस मृत्यु को  
किसी चीज़ से न जोड़ा जाये।




पढ़ लिया करो


कभी कभी नदी को भी पढ़ लिया करो
केवल किताबों को नहीं

कभी कभी लहरों को समझा करो
केवल गणित को नहीं

कभी जानो किसी पेड़ का दुख 
किसी फूल का स्वप्न भी देखा करो

कभी समझा करो चिड़ियों का गीत
कभी पुल से सुना करो उसकी कहानी
कभी सड़क से पूछा करो
उसका दर्द

कभी मछलियों से पूछा करो
किससे करती हैं वे प्रेम

कभी जानो तितलियों के भी ज़ख्म

कभी कभी आसमान से भी बात कर लिया करो
मिलाया करो हाथ
बादलों से भी कभी

कभी चूम लो तुम तारों को
कभी आलिंगन में ले लिया करो
रौशनी को
कभी कुछ लिखो
तो जानो जरूर
शब्दों के भीतर होती है
कितनी पीड़ा।




अंतरात्मा


आखिर तुम उस तरफ क्यों दौड़ रहे हो 
जिस तरफ लोग दौड़े चले जा रहे हैं बिना कुछ सोचे समझे
आखिर तुम उस मेले में क्यों जा रहे हो 
जहां पहले से ही एक फूहड़ नृत्य चल रहा है

आखिर तुम उस पोस्टर में खुद को क्यों दिखाना चाहते हो 
जिस पर आततायियों के फोटो लगे हुए हैं पहले से 

आखिर तुम उस कमरे में क्यों सोना चाहते हो 
जहां तस्करों की एक बैठक पहले से चल रही है 

आखिर तुम उस रजिस्टर पर अपना नाम क्यों लिखना चाहते हो
जिस पर सज़ायाफ्ता अपराधियों के नाम पहले से दर्ज हैं

आखिर तुम उन लोगों के गले क्यों मिलना चाह रहे हो
जिनकी कारस्तानियों से हम सब वाकिफ हैं अच्छी तरह

आखिर तुम उन लोगों से हाथ क्यों मिलाना चाहते हो
जिनके हाथ पहले से खून से रंगे हुए हैं

तुम्हारी अंतरात्मा 
अब क्यों नहीं बची हुई है।




एक नाराज़ कवि के नोट्स

अगर तुम उठाओगे कभी कोई सवाल 
तो वे तुम्हारे खिलाफ ही सवाल उठाएंगे 
वे कहेंगे सबसे पहले 
तुम्हारा सवाल उठाना विधि सम्मत नहीं है
वे यह भी कहेंगे
इस तरह तो सवाल उठाना बिल्कुल जायज नहीं है

अगर तुम उठाओगे सवाल 
तो वे तुम्हारे खिलाफ 
सरेआम एक मजमा लगा देंगे
हिम्मत नहीं है उनमें सच बोलने की 
इसलिए वे सच छिपा लेंगे
 
अपने इरादों के बारे में कभी नही बताएंगे
उल्टे तुम्हे कसूरवार ठहराएंगे
अगर तुम उठाओगे सवाल तो
वे सबसे पहले तुम्हारे खिलाफ ही सवाल उठाएंगे
तुम्हारे लिखे की भाषा पर आपत्ति जताएंगे 
कहेंगे यह व्याकरण सम्मत नहीं है
इसमें गद्य का वह लालित्य नहीं हैं
वे यह भी कहेंगे यह भाषा हो चुकी पुरानी
इसमें अब कुछ भी नवाचार नहीं है
अब कोई नई संभावना नहीं बची है इसमें
इसलिए जो उठाया गया है सवाल वो है बेमानी
जब तुम उठाओगे सवाल
तो वे पहले तुम्हारे शिल्प पर बात करेंगे 
और कहेंगे इस शिल्प में अब कुछ नया नहीं कहा जा सकता है
यह तो पिष्टपेषण है
छिद्रान्वेषण है
इसमे नहीं है अर्थ छवियों की गुंजाइश 
अगर तुम उठाओगे सवाल तो वे कहेंगे तुमसे
तुम तो सभी से रहते हो नाराज तुम्हारा काम क्या है 
हम अच्छी तरह से जानते हैं
इसलिए तुम्हारे विरोध में कोई दम नहीं है
अगर तुम उठाओगे सवाल 
तो तुम्हारे सवाल पर ही वे सवाल उठाएंगे 
फिर वे तुम्हारे अतीत में जाएंगे 
और कहेंगे तुम्हारे पुरखे भी तो ऐसे ही थे 
फिर वे कहेंगे
कि तुम्हारी तस्वीर अच्छी नहीं है तुम्हारी आवाज भी अच्छी नहीं
तुम्हारी कमीज पर लगे हैं दाग
सवाल उठाने का तुम्हारा अंदाज़ भी अच्छा नहीं है

अगर तुम उठाओगे सवाल तो
वे तुम्हारी कमीज के बारे में पूछेंगे 
कहेंगे इस कमीज की सिलाई अच्छी नहीं है 
इसका रंग भी है बहुत बेकार 

तुम उठाओगे सवाल
तो वे तुम्हारे लिखे को तोड़मरोड़ देंगे
और तुम्हे संपादन का गुर बताएंगे तुम्हारे लिखे में से हत्यारे का नाम ही मिटा देंगे
उन्हें बचाने के लिए 
स्थानाभाव के नाम पर 
कई पंक्तियों को हटा देंगे
मिटा देंगे उस जलसे का नाम
जिनमें शिरकत कर वे खुद आये हैं

अगर तुम उठाओगे सवाल 
तो तुम्हें चारों तरफ से घेर लिया जाएगा
कहा जाएगा 
 --बोलो !बोलो !आखिर तुम बोलो
बादशाह के खिलाफ तुमने किस् से पूछकर यह सवाल उठाया है?





अकेली नावें

कई नावें बहुत अकेली होती हैं
इतनी अकेली होती है
कि कई बार लहरें भी उन्हें छूने नहीं आतीं 
नहीं आती कोई मछली उनसे बात करने
देखता तो उन्हें चंद्रमा भी रहता है 
देखते तो उन्हें तारे भी रहते हैं 
पर वे कहां बात करते हैं
किसी नाव से
कई नावें है
जो बहुत अकेली होती हैं
नदी के तट पर
या फिर बहुत दूर नदी के बीच 
जहां वे दिखाई भी नहीं देती

इतनी अकेली होती हैं
कई बार दिन में 
किसी यात्री को देखकर खुश भी हो जाती हैं
कोई आया तो है उसके पास 
कोई जानता नहीं 
उसका भी कोई दुख  
कहां कोई पूछता है
किसी नाव से कोई आदमी
उसका दुख
कौन जानना चाहता है
इस संसार में 
सभी अपने जीवन के बारे में सोचते हैं
सभी अपनी ही व्यथा कथा कह रहे होते हैं
कोई नहीं जानना चाहता है 
नदियों की व्यथा 
न जानना चाहता है 
लहरों का संघर्ष 
न तट की पीड़ा
न रेत की वेदना

कई नावें बहुत अकेली होती हैं 
गुजार देती है अपनी जिंदगी
अपने अकेलेपन में
कई दम तोड़ देती हैं 
नदी के किनारे
या फिर समुद्र में
या फिर वे नदी के भीतर डूब कर चली जाती है किसी से मिलने
अतल में
कोई उनसे बात कर सके
कोई सीप कोई शंख
कोई मछली उनसे पूछ सके
उनका हाल चाल 
बहुत अकेली होती है वें
इतना अकेलापन ठीक नहीं है
किसी नाव के लिए
अगर हैं अकेली
तो क्या किया जा सकता है
जीवन को तो लोग जीते ही हैं ना  
जीती तो नाव भी
जिंदगी भले ही
किसी ने नहीं लिखी उसकी कहानी 
न लिखी उसने अपनी कोई आत्मकथा 
नाव के बारे में जानना हो 
तो पूछो एक दूसरी नाव से 
जो अभी जिंदा है डूबने के बाद भी
किसी तरह
और मछली की तरह तड़प रही है पानी के ऊपर 
वही बता सकती है

नाव क्यों कई बार अकेली हो जाती है
पर लड़ती रहती हैं लहरों से 
नदी के उस पार जाने के लिये।




नींद के लिए सपने

मै क्यों देखता हूँ इतने सपने 
रात में ही नहीं दिन में भी
विस्तर पर नहीं 
बस और ट्रेन में भी
आखिर इतने सपने क्यों देखने लगा हूँ मै
इस उम्र में
जबकि अमूमन नहीं होते पूरे मेरे सपने
लोग मुझ से कहते हैं बार बार 
ठीक नहीं इतने सपने भी देखना
पर क्यों देखने लगा हूँ इतने सपने हर रोज़ मैं 
अँधेरे में 
जब रोशनी कम होती जा रही है
जब पेड़ की छाया घटती जा रही है
गोलियां चलने लगी हैं शहर में
कभी बंद नहीं होगा मेरी आँखों में कोई सपना
अगर मै जिन्दा हूँ अभी तक ज़िन्दगी में
तो वे सपने ही थे जिन्हें पूरा करने के लिए 
इतना वक़्त गुजार लिया मैंने
जब सपने देखता हूँ तो प्यारी सी नींद आती है मुझे 
और तुम भी आज तक उसी किसी एक सपने में हो बैठी 
मेरे सामने उसी तरह जिस तरह तुम पहली बार मिली थी 
मुझसे एक सपने में।


माफीनामा-1


माफ कर दो ओ तितली
14 साल पुरानी घटना के लिए

माफ कर दो ओ मछली
कभी तुमको ऐसा कुछ कह दिया
जो नहीं कह देना चाहिए था
अचानक टेलीफोन पर
नाम और आवाज़ बदलकर

माफ कर दो वर्षा रानी

अमित्र मत करो
मुझे ओ पानी की बूंदें !

मत तोड़ो संवाद इस तरह
अपने हर अपराध के लिए 
करता हूँ कबूल 
जब हो रही है शाम
हो रही जब रात
जब आनेवाला हो कोई तूफान

कह ने दो मुझे सच
ओ 
ब्रह्मलता !

मैंने कुछ भी अनिष्ट नहीं किया
तुम्हारा 
नहीं मिलते अगर कहीं कोई विचार
शत्रु नहीं हूं तुम्हारा
14 साल गलत फहमियां रही
रहा इतना सालों भयभीत
नहीं हुई हिम्मत
कभी
मिल सकूं
कह सकूं
वो कविता पसंद आई थी मगर...

माफ कर दो
ओ नन्हीं चिड़िया
हमने तुम्हारे पंख नहीं तोड़े

अब जब घेर रही मृत्यु
सबको लिख रहा हूँ
एक माफीनामा 
नहीं अदावत किसी से मेरी
नहीं लड़ाई

सबकी हैं किताबें
पास मेरे 
खोजता हूँ जब कोई रोशनी
पलटता हूँ उनके पन्ने
उनके शब्द ही मुझे ले आते है
हाथ पकड़कर 
बाहर अंधेरे से !





माफीनामा- 2

अब मैंने माफी मांग ली तारों से
कभी उनको टूटा हुआ तारा बोला था

माफी मांग ली है पेड़ों से
कभी कहा था उनसे
तुम्हारे पत्ते झर गए हैं

माफी मांग ली है मछलियों से
उन्हें आग में भून कर खाया था कभी

माफी मांग ली है शब्दों से
जिनका गलत प्रयोग किया था
तुम्हें खत लिखते हुए

अंत में मैंने
एक कवयित्री से माफी मांग ली 

एक कविता लिखकर

अभी कई लोगों से माफी मांगनी है

अंत में अपने जीवन से मांग लूंगा माफी 
क्योंकि तब मैं अपनी धुन में था
उसे कायदे से जी नहीं पाया था।

माफीनामा- 3

लिखना है मुझे
अभी एक और माफीनामा
उसके लिए
जिसका दिल मैंने अनजाने में दुखा दिया था
दरअसल मैंने तो सत्य बयान किया था
लेकिन उससे कोई हो गया आहत
इसलिए मांग रहा हूँ
अब माफी 
लिखकर एक नया माफीनामा
एक ही भाषा में नहीं लिखना चाहिए
पुनरावृत्ति ठीक नहीं
एक ही अनुभव की
बदलना चाहिए प्रतिपल 
अनुभव
सांस भी बदलती है
एक और सांस के जाने के बाद
एक हवा के जाने के बाद
लहरें भी बदल जाती हैं
एक लहर के जाने के बाद

लिखना है मुझे
एक नदी के नाम 
एक माफीनामा
एक जंगल के नाम
एक और माफीनामा

पर क्या हर माफीनामा 

है कोई नई चीज
कोई नया अनुभव लिए
चाँद तुम देखते रहना
माफीनामे का प्रूफ

एक भी अशुद्धि
खत्म कर देगी
गरिमा 
माफीनामे की !


विमल कुमार 


हिंदी के वरिष्ठ कवि पत्रकार विमल कुमार 9 दिसम्बर को 65 वर्ष के हो रहे हैं।पटना में जन्मे श्री कुमार के 8 कविता संग्रह छप चुके हैं।इसके अलावा 3 व्यंग्य संग्रह एक उपन्यास एक कहानी संग्रह और पत्रकारिता से जुड़े लेखों की किताब।वे आजकल स्त्रीलेखा पत्रिका के संपादक हैं और स्त्रीदर्पण वेबसाइट के संयोजक।उन्हें कई पुरस्कार मिले पर कुछ पुरस्कार उन्होंने लौटाए भी हैं।हाल ही में उन्होंने बिहार सरकार के 4 लाख रुपए का दिनकर पुरस्कार लौटाया है।

संपर्क -vimalchorpuran@gmail.com



सभी पेंटिंग: वाज़दा ख़ान 












Comments

  1. डॉ उर्वशी5 December 2025 at 18:55

    विमल कुमार की ये कविताएँ हमारे समय की सबसे संवेदी, त्रस्त और बेचैन आत्मा का बयान हैं, जहाँ स्मृति, जीवन, मृत्यु, अकेलापन, आत्मदर्शन, प्रकृति और सामाजिक विसंगतियाँ एक साथ धड़कती हैं। एक कप चाय की साधारण-सी स्मृति से लेकर गुमशुदा आदमी की अस्तित्व-खोज तक, और माफीनामों की आत्मस्वीकृतियों से लेकर सबसे सुंदर जगह की प्रेमिल उर्वरता तक—हर कविता मनुष्य के भीतर छुपे घायल, करुण और उत्तापपूर्ण संसार को उजागर करती है। विमल की भाषा सरल है, पर इस सरलता में जो कंपन है, वह पाठक को भीतर तक हिला देता है; उनके रूपक साधारण जीवन से उठते हैं, मगर उसी साधारण में वे असाधारण मानवीय अर्थ और युगबोध खोज लेते हैं। आत्म-प्रश्न, क्षमा-याचनाएँ, नैतिक द्वंद्व, अकेली नावों की त्रासद प्रतीकात्मकता और सपनों की न समाप्त होने वाली रोशनी—इन सबके बीच कवि कहीं भी अपने समय की हिंसा, नकली नैतिकताओं और खोखले सार्वजनिक विमर्श से नज़र नहीं चुराता। इन कविताओं में एक अनुभव—एक मनुष्य—एक नागरिक—और एक अकेले, सजग, घायल कवि की गूँज बार-बार लौटती है, जो हिंदी कविता को अपनी सादगी, ईमानदारी और भावनात्मक पारदर्शिता से समृद्ध करती है।

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  2. Shandar.. jaandar... jabardast....jindabaad.....
    Samvedna ke tantr hile
    Ahshaso ke mantra mile
    Antrman ke nayan geele
    Ek kavi se hum aaj mile....

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  3. आलोक कुमार मिश्र5 December 2025 at 20:19

    विमल जी की कविताओं में स्मृति और बोध बहुत सुंदर ढंग से आई हैं। एक कप चाय की स्मृति मात्र एक अच्छे व्यक्ति की स्मृति ही नहीं है बल्कि एक सुंदर दुनिया का सपना देखा रहे और इसके लिए छोटे छोटे प्रयास कर रहे साधारण लोगों के प्रति विनम्र कृतज्ञता का बोध भी है जो कवि की हर कविता में है। माफीनामा सीरीज की कविताएं भीतर तक उतरती हैं। जाने अनजाने हुई भूलों के प्रति भी इतनी सतर्कता, भावुकता ही किसी को बेहतर इंसान बनाती है। वस्तुतः ये कविताएं इंसान होते जाने की यात्रा का खूबसूरत वर्णन ही हैं। कुछ कविताएं लंबी हो गई हैं, पर रोचकता बनाए रखती हैं। कवि को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं।

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  4. अनामिका चक्रवर्ती5 December 2025 at 20:19

    वाह शानदार
    विमल जी की कविताएं पढ़ना सुखद है
    बहुत-बहुत बधाई Vimal Kumar जी को

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  5. राहुल झा5 December 2025 at 20:20

    विमलजी बेहद ज़रुरी कवि हैं...

    जिनकी कविता में समकालीनता अपने खाँटी तेवर के साथ मुखर है...

    और उनकी यह मुखरता
    एक ठोस अर्थ में आलोचनात्मक पुनर्पाठ ही तो है...!

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  6. हरगोविंद पुरी5 December 2025 at 20:20

    बहुत अच्छी और महत्वपूर्ण कविता।

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  7. नरसिंह मिश्रा5 December 2025 at 20:21

    कविताएं अच्छी लगीं विशेषकर तुम्हारी बाहो में और अंतरात्मा . कवि को बधाईं .
    नमस्कार.

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  8. पंकज चौधरी5 December 2025 at 20:23

    हार्दिक शुभकामनाएं। विमल जी को पढ़ता हूं।

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  9. सुमंत शरण5 December 2025 at 21:42

    इस अच्छा आदमी या कह लीजिए कवि से जिसकी "निश्च्छल हंसी कैद है/सफेद दाढ़ी में" मेरी भी भलीभांति वाक़फ़ियत है। टेलिफोन पर गाहे बगाहे इस 'अच्छा' आदमी ने मेरी कितनी धुनाई की है/पीठ सहलाई की है - कह नहीं सकता! ऐसी निश्च्छलता की आज की दुनिया में सबसे अधिक दरकार है। ऐसे में हम इस सफेद दाढ़ी की शफ्फाक मौजूदगी का जश्न तो मना ही सकते हैं!

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  10. गरिमा सिंह6 December 2025 at 01:43

    बहुत अच्छी कविताएं हैं 👌

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  11. स्वप्निल श्रीवास्तव6 December 2025 at 02:54

    विमल का रंग ही अलग है
    बहुत अच्छी और प्यारी कविताएं।

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  12. शुभा द्विवेदी6 December 2025 at 18:20

    बहुत अच्छी कविताएँ । सपाट बयानी की कविताएँ । सच को जैसा जाना पहचाना- वैसा ही व्यक्त किया । आम आदमी के जीवन को,उसके संघर्ष को, सच के प्रति और श्रम के प्रति उसकी प्रतिबद्धता को सजगता से और बिना किसी लाग लपेट के रेखांकित करती कविताएँ ।@ विमल जी को इन कविताओं के लिए शुभकामनाएँ।💐

    - शुभा द्विवेदी

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  13. निर्मला सिंह7 December 2025 at 00:37

    वार्तालाप करती सी कविताएं, बड़ी अच्छी लगीं 💐🌹

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  14. रजत सान्याल7 December 2025 at 00:37

    विमल कुमार जी अलग शैली में कविताएं लिखते है जैसे हम कोई बातचीत या कथोपकथन सुन रहे या पढ़ रहें हैं। बहुत बधाई विमल जी बेहतरीन कविताओं के लिए। शंकरानंद जी आभार आपका।

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  15. कुमार विजय गुप्त7 December 2025 at 02:50

    बहुत अच्छी और समय को चित्रित करती हुई कविताएं हैं. विभिन्न विषयों पर अपनी लेखनी चलाने वाले Vimal Kumar सर को बधाई. कौशिकी के माध्यम से ऐसी बेहतरीन रचनाएँ हमारे सामने आ रही हैं, इसके लिए आपको धन्यवाद 💐

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  16. वाज़दा ख़ान7 December 2025 at 03:17

    विमल कुमार सर की कविताएं मुझे बहुत प्रिय हैं।उनकी कविताओं की मै नियमित पाठिका हूं। विमल जी हमारे समय की फिजा में ,हमारे इर्दगिर्द ,हमारे भीतर तैरती संवेदना , पीड़ा, बैचेनी और मन को झंझोड़ देने वाले सवालों की बात करते हैं।वे मनुष्य होने की बात करते हैं। आपकी कविताएं एक ईमानदार कवि की ईमानदार कविताएं हैं । जो अंतर्मन को भीतर तक छूती हैं, विचलित करती हैं ।। बहुत शुभकामनाएं

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  17. बहुत प्रयत्न के बाद लिंक पर पहुँचा...विमल जी की कविता पढ़ने की उद्विग्नता बढ़ती जा रही थी...विमल जी एक सचेत नागरिक हैं, इस कारण उनकी कविताओं में वर्तमान की ध्वनि साफ़-साफ़ सुनी जा सकती है, जिससे प्रत्येक मनुष्य दरपेश है...

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    1. कौशिकी8 December 2025 at 00:18

      गूगल,फेसबुक, व्हाट्सएप, टेलीग्राम, ट्विटर सहित लगभग सभी माध्यमों पर 'कौशिकी' का लिंक शेयर किया जाता है ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों तक 'कौशिकी' पहुंच सके। फिर भी आपको हुई असुविधा के खेद है। Kaushikinew.blogspot.com पर क्लिक कर कविताएं पढ़ सकते हैं।

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  18. इरा श्रीवास्तव8 December 2025 at 00:28

    एक नाराज़ कवि के नोट्स, और पढ़ लिया करो बेहतरीन। बधाई Vimal ji 💐

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  19. मीठेस निर्मोही10 December 2025 at 22:27

    वाह! कवि मन के द्वंद्व और युग यथार्थ को अभिव्यक्त करती एक बेहतरीन कविता।

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