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Showing posts from January, 2026

वाज़दा ख़ान की कविताएं

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वाज़दा ख़ान  वाज़दा ख़ान की कविताओं में हमारे समय का वह अंधकार दर्ज है जिसमें कुछ नहीं सूझता।यह चारों तरफ फैल चुका है और सब कुछ को अपने में समेटने की कोशिश कर रहा है। अपने समय और समाज को जब वे देखती हैं तो कला की आंख से कुछ छुप नहीं पाता।रंग और शब्द मिलकर एक नया अर्थ बताते हैं और यही इन कविताओं की विशेषता है। गठरी अपने बचपन की पोटली उठाये मैं जब चली थी पोटली, दादी मां का पिटारा नहीं थी कि मैं उसे खोलती और उसमें से परियां निकलतीं घोड़े पर सवार राजकुमार निकलता और तो और खुद को राजकुमारी समझने की भूल करती उन गठरियों में तो अतिरिक्त और बेहद अतिरिक्त सावधानी या असावधानी से बरती जाने वाली तमाम क्रूरतायें, टोका-टाकी और उपेक्षायें दर्ज हैं जिन्होंने हमें बेहद क्रूर, अन्धेरी भरी ठण्डी अव्यावहारिक दुनिया दी, अब वे हमसे सुन्दर दुनिया मांगते हैं कहां से लाऊंगी वह इतिहास आने वाली नस्लों के लिये जिसमें पढ़ती हूं गार्गी, मैत्रेयी, ललयद। जिसमें दर्ज हो एक उन्नत सभ्यता जो बनी हो संवेदनाओं से, अंखुआते रंगों से और उस प्रकाश से जो जोखिम भरे रास्तों पर चलने के बावजूद आत्मा को भीतर आलोकित रखता है। अन्धेर...

वंदना राग की कहानी

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                              वंदना राग  ' कौशिकी' में इस सप्ताह पढ़िए वंदना राग की कहानी 'बूढ़े की खुजली '। उनकी कहानियों पर टिप्पणी है महत्वपूर्ण कवि और कथाकार उमा शंकर चौधरी की।  वन्दना राग अपनी कहानियों में अपने समकाल को रचती हैं। हमारे समय के जो अंतद्वंद्व हैं वही उनकी कहानियों के विषय हैं। यहां साम्प्रदायिकता की समस्या से लेकर बाजार, बाजारवाद और मानसिकत गुलामी का विषय बहुत प्रमुख रूप में आया है। यहां सिर्फ स्त्री की चिंता नहीं है बल्कि यहां एक स्त्री की निगाह से देखे गए समाज में व्याप्त विषमताओं को पकड़ने की कोशिश है। एक स्त्री का सजग मन है यहां। चूंकि एक लेखिका सजग निगाह से इस समाज को देखने-समझने का प्रयास कर रही है तो निश्चितरूपेण समाज को देखने का एक नया नज़रिया यहां व्याप्त है। मनोविश्लेषणात्मक स्तर पर समस्याओं को समझना, उसे विश्लेषित करना वन्दना राग की कहानियों की एक खास विशेषता है। वे अपने पात्रों के करीब जाकर उसके साथ चलकर उसका निर्माण करती हैं। उनके पात्र अपनी सामान्य हरकतों से, सामान्य व्या...

प्रियदर्शन की कविताएं

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                                      प्रियदर्शन   प्रियदर्शन की कविताएं मनुष्य और उसके आसपास की कविताएं हैं जहां जीवन के सामने संकट सबसे गहरा है। दौड़ती भागती जिंदगी और चमक दमक के तमाम उपकरणों के बीच वे लुप्त होती हुई चीजें भी हैं जो बिना किसी शोर के हमारे बीच से गायब हो रही हैं और उनका गायब होना एक सामान्य सी बात लगती है। कोई हैरानी नहीं। कोई शोक नहीं। कोई ग्लानि नही।कवि ही हैं जो उन चीजों को देखते हैं और हमें याद दिलाते हैं कि हम कितना कुछ खोते जा रहे हैं दुनिया को मुट्ठी में कर लेने की गलतफहमी के बीच। 'कुछ अस्फुट सी यादें' और 'कविता विस्मृति की' श्रृंखला की ये दस कविताएं ठहर कर सोचने को बाध्य कर देती हैं और यही इन कविताओं की ताकत है कि ये असर पैदा करती हैं।                             कुछ अस्फुट सी यादें एक पत्ती की याद दिसंबर के कुहासे में कुछ सिकुड़ा-दुबका सा था एक विराट पेड़ मगर सबसे ऊंची शाख पर एक फुनगी हिल रही ...