वाज़दा ख़ान की कविताएं
वाज़दा ख़ान वाज़दा ख़ान की कविताओं में हमारे समय का वह अंधकार दर्ज है जिसमें कुछ नहीं सूझता।यह चारों तरफ फैल चुका है और सब कुछ को अपने में समेटने की कोशिश कर रहा है। अपने समय और समाज को जब वे देखती हैं तो कला की आंख से कुछ छुप नहीं पाता।रंग और शब्द मिलकर एक नया अर्थ बताते हैं और यही इन कविताओं की विशेषता है। गठरी अपने बचपन की पोटली उठाये मैं जब चली थी पोटली, दादी मां का पिटारा नहीं थी कि मैं उसे खोलती और उसमें से परियां निकलतीं घोड़े पर सवार राजकुमार निकलता और तो और खुद को राजकुमारी समझने की भूल करती उन गठरियों में तो अतिरिक्त और बेहद अतिरिक्त सावधानी या असावधानी से बरती जाने वाली तमाम क्रूरतायें, टोका-टाकी और उपेक्षायें दर्ज हैं जिन्होंने हमें बेहद क्रूर, अन्धेरी भरी ठण्डी अव्यावहारिक दुनिया दी, अब वे हमसे सुन्दर दुनिया मांगते हैं कहां से लाऊंगी वह इतिहास आने वाली नस्लों के लिये जिसमें पढ़ती हूं गार्गी, मैत्रेयी, ललयद। जिसमें दर्ज हो एक उन्नत सभ्यता जो बनी हो संवेदनाओं से, अंखुआते रंगों से और उस प्रकाश से जो जोखिम भरे रास्तों पर चलने के बावजूद आत्मा को भीतर आलोकित रखता है। अन्धेर...