अनामिका की कविताएं
अनामिका अनामिका की कविताओं में समय, समाज और संस्कृति अपनी परंपरा और भाषाई विविधता के साथ पूरेपन में मौजूद है।यही कारण है कि इन कविताओं में एक अलग सम्मोहन है। पाठक इनकी कविताओं से गुजरते हुए बहुत कुछ सुनता,गुनता और समेटता हुआ चलता है। समकालीन कविता में लोक के साथ कोमल भाषा शैली और बिंब की मौलिक ध्वनि इन्हें विशिष्ट और अनिवार्य बनाती रही है। यू ट्यूब पर कांतासम्मित मेरा उनसे एक अजब तरह का रिश्ता है । जब भी बहुत ज़्यादा थक जाती हूँ, मैं देखती हूँ इनका चैनल , ये मुझको हाथ पकड़कर एक नई दुनिया में ले जाती हैं , जो दरअसल बहुत पुरानी है- माँ के डाले खट्टे- मीठे नींबू अचार- सी चटक, क़स्बे की दुनिया- सी एकदम सरल और सुंदर । ये कितने आराम से बोलती हैं ! इनके स्वर में उमा दी वाला धीरज है। जैसे राजा हर्षवर्धन थे, वैसी वे- तैयार सब संचित निधियाँ लुटाने को , मुक्तहस्त बाँटने को सारे कौशल , सारे गुर और राज़ सारे जो गृहस्थी की तपस्या में अर्जित किए थे या दादी- नानी, बुआ- मौसी, माँ से सीखे थे- पाकविधियाँ और कढ़ाई- बुनाई के नमूने, केश सज्जा , र...