लीलाधर जगूडी की कविताएं
लीलाधर जगूड़ी वरिष्ठ कवि लीलाधर जगूड़ी की कविताओं में मनुष्य और प्रकृति के साथ उसकी जिजीविषा भी है। यहां कठिन जीवन का ऐसा संगीत गूंजता है जिसमें परंपरा है तो आधुनिकता भी। काव्य भाषा से लेकर बिंब तक में पहाड़ की चमक कौंधती है और चकित कर देती है। जीवन के अनदेखे दृश्यों को देखने की ललक और गुम होते हुए को बचा लेने की चाह पैदा करती इन कविताओं में टटकापन है। यही इनकी विशेषता भी है। बिना नाव बिना नाव जैसे बीज नदियां पार कर लेते हैं उस तरह किसी के काम आकर मैं कहीं जाकर फिर से उगना चाहता हूं मैं उगूं और किसी को लगे कि यह तो शब्द है भाषा है बीजों की तरह उड़कर शब्द भी चले जाते हैं किसी दूसरी भाषा में इस सफर में फूल और पत्थर भी भाषा बन जाते हैं आधे अधूरे व्यंजन भी स्वर पा जाते हैं एक टहनी की मधुमक्खियों जैसी उड़ान दूर खड़े पेड़ की टहनियों को सफल बना देती है भूख और मेहनत दोनों रचते हैं वसंत पैर भी खुरों जैसे ही कुचलते हैं पृथ्वी को। घास के पूले अचरज हुआ घास के पूलों को चलता देखकर पूले पर पू...